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ZEE Jankari : गरीबी हटाने के लिए देश की सरकारों और सिस्टम ने पूरे मन से कोशिश नहीं की

सबसे बड़ा मुद्दा था. गरीबी दूर करना.. लेकिन गरीबी कभी दूर नहीं हो पाई. ऐसा लगता है कि हमारे देश की सरकारों और बुद्धिजीवियों ने गरीबी को दूर करने के लिए 100 वर्षीय योजना बनाई है.

ZEE Jankari : गरीबी हटाने के लिए देश की सरकारों और सिस्टम ने पूरे मन से कोशिश नहीं की

अगर किसी भी समस्या को जड़ से पकड़ लिया जाए तो उसे दूर करने के लिए कितना समय लगना चाहिए? 5 साल, 10 साल या 15 साल ? लेकिन अगर 71 वर्ष या 100 वर्ष तक भी कोई समस्या दूर ना हो पाए, तो समझ लेना चाहिए कि हमारे देश की सरकारों और सिस्टम ने पूरे मन से कोशिश नहीं की. गरीबी की समस्या के साथ भी ऐसा ही हुआ है. आज़ादी से अब तक के 71 वर्षों में देश ने 15 प्रधानमंत्री देख लिए, अलग अलग पार्टियों की सरकारें देख लीं, पंचवर्षीय योजनाएं देख लीं, चुनावी घोषणापत्र देख लिए और गरीबों को नायक बनाने वाली फिल्में भी देख ली. इन सबका सबसे बड़ा मुद्दा था. गरीबी दूर करना.. लेकिन गरीबी कभी दूर नहीं हो पाई. ऐसा लगता है कि हमारे देश की सरकारों और बुद्धिजीवियों ने गरीबी को दूर करने के लिए 100 वर्षीय योजना बनाई है. एक नई रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक पूरी दुनिया में अमीरों और गरीबों के बीच की खाई और ज्यादा बढ़ गई है. 2018 में अमीर और ज्यादा अमीर हो गये और गरीब और ज्यादा गरीब होते चले गये. भारत की करीब 52% दौलत सिर्फ 1% अमीरों के पास है. और भारत के साढ़े 13 करोड़ लोग वर्ष 2004 से ही कर्ज़ में डूबे हुए हैं। ये वो लोग हैं जो सबसे गरीब हैं. दुनिया भर में आर्थिक सर्वे करने वाली संस्था Oxfam ने ये नई रिपोर्ट जारी की है.

हमारे देश की राजनीति में गरीबी खत्म करने के नारे दशकों से लग रहे हैं. गरीबी को चुनावी घोषणापत्र का हिस्सा बनाकर वोट मांगे जा रहे हैं. लेकिन ये अभी तक खत्म नहीं हुई. आखिर भारत को गरीबी से मुक्ति कब मिलेगी? और 71 साल तो खर्च हो चुके, और कितने वर्ष चाहिएं? यही सवाल हमारे आज के विश्लेषण का आधार है. Oxfam की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के सबसे अमीर 1% लोगों की संपत्ति में 39% की बढ़ोतरी हुई है. जबकि देश की आधी जनसंख्या ऐसी है, जिसकी संपत्ति में सिर्फ 3% का इज़ाफ़ा हुआ है.

देश के सबसे ज्यादा गरीब 10% लोगों की संख्या 13.6 करोड़ है, और ये सभी लोग 2004 से लगातार कर्ज़ में डूबे हुए हैं. भारत की कुल दौलत का 77.4% हिस्सा सिर्फ 10% लोगों के हाथ में है, जबकि देश के सिर्फ 1% अमीरों के पास देश की करीब 52% संपत्ति है. विरोधाभास ये है कि भारत की 60% जनता के पास, देश की सिर्फ 4.8% दौलत है और सिर्फ 9 अरबपतियों के पास ही भारत की आधी आबादी जितनी संपत्ति है.

भारत में पिछले साल 18 नए अरबपति बने हैं, और अब भारत में कुल 119 अरबपति हो गए हैं, जिनकी संपत्ति 23 लाख करोड़ रुपए से बढ़कर 31 लाख करोड़ रुपये हो गई है. इस रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि अगर भारत के सबसे अमीर, एक प्रतिशत लोग सिर्फ आधा प्रतिशत ज्यादा टैक्स देने लगें, तो सरकार देश के स्वास्थ्य बजट को 50% बढ़ा सकती है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत सरकार और भारत की सभी राज्य सरकारें. स्वास्थ्य, स्वच्छता और पानी की आपूर्ति पर 2 लाख 8 हज़ार 166 करोड़ रुपये खर्च करती हैं, जो देश के सबसे अमीर व्यक्ति मुकेश अंबानी की कुल संपत्ति 2.8 लाख करोड़ रुपये से कम है.

इस रिपोर्ट में भारत की शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था पर बहुत बड़ा कटाक्ष किया गया है. रिपोर्ट में लिखा गया है कि भारत में अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं एक तरह से Luxury बन चुकी हैं, इनका खर्च सिर्फ अमीर लोग ही उठा सकते हैं. वैसे भारत में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में गरीबों की स्थिति खराब है. दुनिया के सिर्फ 26 सबसे अमीर अरबपतियों के पास दुनिया के 380 करोड़ लोगों जितनी संपत्ति है, और ये पूरी दुनिया की आधी जनसंख्या के बराबर है.

2017 में दुनिया के आधी आबादी जितनी संपत्ति सिर्फ 43 लोगों के पास थी और 2018 में आधी आबादी जितनी संपत्ति सिर्फ 26 लोगों के पास है.
2018 में पूरी दुनिया के 2200 अरबपतियों की संपत्ति में 900 बिलियन अमेरिकी डॉलर्स का इज़ाफा हुआ. यानी इन अरबपतियों की संपत्ति ढाई बिलियन डॉलर प्रतिदिन के हिसाब से बढ़ी.

इस रिपोर्ट में एक और विरोधाभास भी देखने को मिला. वर्ष 2018 में दुनिया के सबसे अमीर लोगों की संपत्ति 12% की दर से बढ़ी, जबकि दुनिया की आधी आबादी की संपत्ति 11% की दर से कम हुई है. इस रिपोर्ट से ये भी पता चला है कि 2008 में दुनिया में आई आर्थिक मंदी के 10 वर्षों के बाद अरबपतियों की संख्या दोगुनी हो गई है. 2017 से 2018 के बीच हर दो दिन में एक नया व्यक्ति अरबपति बना है.

दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति और Amazon के मालिक Jeff Bezos की संपत्ति बढ़कर 112 बिलियन अमेरिकी डॉलर्स हो गई. Jeff Bezos की सिर्फ 1% संपत्ति साढ़े 10 करोड़ की आबादी वाले अफ्रीकी देश Ethiopia के स्वास्थ्य बजट के बराबर है. ये रिपोर्ट बताती है कि पूरी दुनिया में दौलत का साम्राज्य अपनी जड़ें बहुत गहराई तक जमा चुका है. असमानता के इस संकट को दूर करने के लिए एक ऐसी अर्थव्यवस्था का निर्माण करना होगा, जो अमीरों और शक्तिशाली लोगों के लिए नहीं बल्कि आम लोगों के लिए काम करे.

वर्ष 1965 में एक फिल्म Release हुई थी... सिकंदर-ए-आज़म. इस फिल्म का एक बहुत मशहूर गीत है... जहां डाल-डाल पर सोने की चिड़िया करती है बसेरा... वो भारत देश है मेरा. हमारे देश में स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर ये गीत ज़रूर सुना जाता है. इस गीत में भारत के प्राचीन वैभव के बारे में बताया गया है. यहां जिस भारत की कल्पना की गई है उसमें गरीबी का कोई नामो निशान नहीं है. लोग ईमानदार हैं और अपने जीवन से संतुष्ट हैं इसीलिए कोई अपराध भी नहीं है. आप कह सकते हैं कि ये एक तरह से राम राज्य की स्थिति है.

भारत में राम राज्य लाना, महात्मा गांधी के जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य था. 2 मार्च 1930 को महात्मा गांधी ने भारत के तत्कालीन Viceroy, Lord Irwin को एक चिट्ठी लिखी थी. इस चिट्ठी में महात्मा गांधी ने ये बताया था कि भारत में अंग्रेज़ों का राज..एक अभिशाप क्यों है? इस ऐतिहासिक चिट्ठी में महात्मा गांधी ने लिखा था कि भारत का स्वतंत्रता आंदोलन, भारत के सबसे गरीब लोगों के अधिकारों के लिए ही किया जा रहा है.  यानी गरीबी, आज़ादी से पहले भी एक बहुत बड़ा मुद्दा था और आज भी गरीबी भारत के लिए एक बहुत बड़ा मुद्दा है. 15 अगस्त 1947 को जब देश आज़ाद हुआ तो दुनिया के सामने एक ऐसा भारत था जिसे अंग्रेज़ बहुत बुरी तरह से लूट चुके थे.

 वर्ष 1951 से 1955 के बीच हुए Survey के मुताबिक उस समय भारत में कुल 19 करोड़ 87 लाख गरीब थे. 1956 से 1960 के बीच हुए Survey के मुताबिक भारत में 21 करोड़ 95 लाख गरीब थे. और 1961 से 1965 के बीच हुए Survey के मुताबिक भारत में 22 करोड़ 16 लाख गरीब थे.

आज़ादी के करीब 20 वर्ष बाद ही कांग्रेस पार्टी से जनता का मोहभंग होने लगा था. लोगों का सब्र टूटने लगा था। लेकिन इंदिरा गांधी ने जनता की इस भावना को अपना चुनावी एजेंडा बना लिया. वर्ष 1971 के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी ने एक नारा दिया... गरीबी हटाओ. इस नारे के बाद इंदिरा गांधी गरीबों की मसीहा बन गईं. देश के दलित और मुसलमान, इंदिरा गांधी के साथ मज़बूती से खड़े हो गये और इस नारे के दम पर इंदिरा गांधी को बहुत बड़ी जीत मिली. लेकिन इसके बाद भी गरीबी नहीं मिटी.
 
ऐसा नहीं है कि पहली बार इंदिरा गांधी ने ही गरीबी हटाने का नारा दिया था. देश ही नहीं पूरी दुनिया में गरीबों पर सबसे ज़्यादा राजनीति कम्यूनिस्ट पार्टियों ने की. आज़ादी के बाद भारत में कम्यूनिस्ट नेताओं ने नारा दिया था -
देश की जनता भूखी है ये आज़ादी झूठी है धन और धरती बंट के रहेगी, भूखी जनता चुप न रहेगी

लोकनायक जय प्रकाश नारायण के समर्थकों ने देश की गरीब जनता को संबोधित करते हुए ये नारा दिया था कि - 'सम्पूर्ण क्रांति अब नारा है... भावी इतिहास तुम्हारा है'

समाजवादी विचारधारा के नेताओं का एक और मशहूर नारा है...
रोटी, कपड़ा और मकान, मांग रहा है हिंदुस्तान

वर्ष 1980 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने नारा दिया था
आधी रोटी खाएंगे, इंदिराजी को लाएंगे.

जनता पार्टी के राज से परेशान जनता को लुभाने के लिए कांग्रेस ने ये नारा दिया था. ये नारे आज भी सुनने में बहुत अच्छे लगते हैं. लेकिन कड़वा सच ये है कि भारत के करोड़ों लोग आज भी गरीब हैं.

गरीबी और सामाजिक न्याय के नाम पर बनी तमाम पार्टियों के नेता, आज आलीशान बंगलों में रहते हैं, महंगी गाड़ियों में चलते हैं, महंगी घड़ियां और Branded कपड़े पहनते हैं. आप गौर से देखेंगे तो आपको पता चलेगा कि ..इन नेताओं ने अपनी गरीबी को मिटा दिया है. लेकिन जो लोग गरीबी की मार सहन कर रहे हैं उनके जीवन में कोई बदलाव नहीं आया है. गरीबी में संवेदनाओं के खनिज छिपे होते हैं और इससे सफलता का रास्ता खुल जाता है. चित्रकार की पेंटिंग से लेकर फोटोग्राफर की तस्वीर तक....गरीबी सबका प्रिय विषय है.

दुख की बात ये है कि हमारे देश में गरीबी को ग्लैमरस तरीके से बेचा तो गया है लेकिन गरीबी कभी खत्म नहीं हुई. ये इतनी बड़ी समस्या नहीं है जिसे मजबूत इच्छाशक्ति से ख़त्म न किया जा सके, लेकिन गरीबी को ख़त्म करने में उतना ग्लैमर नहीं है जितना ग्लैमर इसे दिखाने में हैं. इस विश्लेषण के अंत में हम आपको हिंदी फिल्मों के कुछ सीन दिखाना चाहते हैं. ये सीन थोड़े पुराने हैं। लेकिन इन्हें देखकर आपको लगेगा जैसे इनमें आज के ज़माने की बात हो रही है.