close

खास खबरें सिर्फ आपके लिए...हम खासतौर से आपके लिए कुछ चुनिंदा खबरें लाए हैं. इन्हें सीधे अपने मेलबाक्स में प्राप्त करें.

यूपी की जनता के दिल में 'बुआ'-'बबुआ' और 'बाबा' को नहीं मिला ठौर

लोकसभा चुनाव 2019 (Lok sabha election results 2019) का फाइनल रिजल्ट आने में अभी कुछ ही घंटे का वक्त है, लेकिन अब तक के रुझानों से स्पष्ट हो गया है कि बीजेपी के नेतृत्व वाला NDA प्रचंड बहुमत वाली सरकार बनाने जा रहा है. इस चुनाव परिणाम ने उत्तर प्रदेश में SP-BSP-रालोद गठबंधन के लिए जश्न मनाने का कोई मौका नहीं दिया, क्योंकि इनका जातीय गणित यहां औंधे मुंह गिरा है.

यूपी की जनता के दिल में 'बुआ'-'बबुआ' और 'बाबा' को नहीं मिला ठौर
Lok sabha election results 2019: पीएम मोदी ब्रांड के सामने यूपी में सारे जातीय समीकरण फेल.

नई दिल्ली: लोकसभा चुनाव 2019 (Lok sabha election results 2019) का फाइनल रिजल्ट आने में अभी कुछ वक्त है, लेकिन अब तक के रुझानों से स्पष्ट हो गया है कि बीजेपी के नेतृत्व वाला NDA प्रचंड बहुमत वाली सरकार बनाने जा रहा है. इस चुनाव परिणाम ने उत्तर प्रदेश में SP-BSP-रालोद गठबंधन के लिए जश्न मनाने का कोई मौका नहीं दिया, क्योंकि इनका जातीय गणित यहां औंधे मुंह गिरा है. इसके अलावा इस चुनाव में राहुल गांधी और प्रियंका गांधी की अगुवाई में कांग्रेस की भी यूपी में करारी हार हुई है. राहुल गांधी तो खुद अमेठी लोकसभा सीट से भी हार गए. इस तरह देखने को मिला कि बुआ (मायावती), बबुआ (अखिलेश यादव) और राहुल गांधी (बाबा) की करारी हार हुई है.

2014 के लोकसभा और 2017 के यूपी विधानसभा चुनावों में करारी हार के बाद धुर विरोधी समाजवादी पार्टी (SP) और बहुजन समाज पार्टी (BSP) और राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) ने आपस में हाथ मिलाने का फैसला लिया था.

यह महागठबंधन जनवरी में अस्तित्व में आया और कहा गया कि यह उत्तर प्रदेश में भाजपा को मात देकर सत्ता में उसकी वापसी की राह रोकेगा. नतीजों के रुझान ने गठबंधन को बिना ताकत का बना दिया है. पूरे चुनाव प्रचार के दौरान BSP सुप्रीमो मायावती अपने हर प्रेस कांफ्रेंस में कहती दिखीं की महागठबंधन के सामने बीजेपी की एक नहीं चलेगी. वहीं कई जानकार भी मान रहे थे कि महागठबंधन के जातीय समीकरण को तोड़ना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी के लिए बड़ी चुनौती होगी. लेकिन जब रिजल्ट आए तो ब्रांड मोदी ने इनके जातीय गणित को ध्वस्त कर दिया.

दलित और पिछड़े का वोटों के कॉम्बिनेशन को BJP ने ऐसे तोड़ा
अपने पारिवारिक झगड़ों से परेशान समाजवादी पार्टी नेतृत्व ने सालों पुरानी अदावत को दरकिनार करते हुए बहुजन समाज पार्टी से गठबंधन किया. इनका गणित साफ था. 40 फीसदी पिछड़ा (ओबीसी) और 21 फीसदी दलित एक साथ आकर राज्य में नया इतिहास लिखेंगे.

2014 में संसदीय चुनाव में एक भी सीट नहीं जीतने वाली और 2017 के विधानसभा चुनाव में महज 19 सीट जीतने वाली BSP को भी यह गणित जादुई दिखा और उसने गठबंधन पर सहमति जताई. भाजपा ने गैर यादव ओबीसी और गैर जाटव दलित पर अपना ध्यान केंद्रित कर इनके सभी आकलन को गड़बड़ा दिया. पार्टी ने इन जातीय समूहों को अपनी तरफ खींच कर गणित को बदल दिया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह कह कर जाति युद्ध को वर्ग युद्ध में बदल दिया कि 'मेरी जाति गरीब की जाति है.'

सीएम योगी ने हिंदुत्व के मुद्दे को पकड़े रखा
इसके अलावा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने आक्रामक हिंदुत्व अभियान के जरिए भी जातीय गोलबंदी को और कमजोर बनाया. चुनाव के नतीजों ने न केवल जाति की राजनीति की ताकत को ध्वस्त किया है बल्कि गठबंधन के भविष्य पर भी प्रश्नचिन्ह लगा दिया है.

नतीजों से यह पता चल रहा है कि SP और BSP एक-दूसरे को अपने वोट ट्रांसफर करने में सफल नहीं रहीं और दलितों तथा ओबीसी के बीच का तनावपूर्ण सामाजिक समीकरण राजनीति पर भारी पड़ गया.

पारिवारिक मनमुटाव में SP ने गंवाई फिरोजाबाद सीट
BSP को तो गठबंधन से फिर भी फायदा हुआ क्योंकि उसने संसद में अपनी उपस्थिति तय कर ली है, घाटा समाजवादी पार्टी को हुआ है. यादव परिवार के दो सदस्य बदायूं से धर्मेद्र यादव और फिरोजाबाद से अक्षय यादव चुनाव हार गए हैं. यह वंशवाद की राजनीति पर भी आघात है जिसे SP ने बढ़ावा दिया. BSP और राष्ट्रीय लोकदल के साथ गठबंधन का फैसला बतौर पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव का था. मुलायम सिंह यादव ने इस पर आपत्ति भी जताई थी. यह पहला चुनाव है जब अखिलेश ने कोई चुनाव अपने पिता मुलायम सिंह यादव के मार्गदर्शन के बिना लड़ा. मुलायम अपने क्षेत्र मैनपुरी तक ही सिमटे रहे. अब इस फैसले पर सवाल उठ सकते हैं और आने वाले दिनों में हो सकता है कि अखिलेश को अपनी पार्टी में इसे लेकर दिक्कत का सामना करना पड़े.

कांग्रेस पूरी तरह फेल
उत्तर प्रदेश में पहले महागठबंधन में कांग्रेस को भी शामिल करने की तैयारी थी, लेकिन मायावती की जिद्द के चलते ऐसा नहीं हो सका. आखिरकार कांग्रेस अकेले चुनाव मैदान में उतरी. लड़ाई में खुद को मजबूत रखने के लिए कांग्रेस ने अपने तुरुप के पत्ते प्रियंका गांधी वाड्रा को उतारते हुए पूर्वांचल की जिम्मेदारी सौंपी थी. चुनाव प्रचार के दौरान प्रियंका ने कहा था कि उन्होंने इस तरह से प्रत्याशी खड़े किए हैं कि बीजेपी को नुकसान हो. बीजेपी ने ना केवल महागठबंधन बल्कि कांग्रेस की भी सारी प्लानिंग को तहस-नहस करके रख दिया.