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मुजफ्फरनगर लोकसभा सीट पर 2014 में 16 साल बाद खिला था कमल, फिर है कांटे की टक्कर

मुजफ्फरनगर लोकसभा सीट पर इस बार कुल 10 उम्मीदवार मैदान में हैं. इस सीट पर भारतीय जनता पार्टी और गठबंधन के बीच महामुकाबला है. मुजफ्फरनगर लोकसभा सीट उत्तर प्रदेश की तीसरा लोकसभा सीट है.

मुजफ्फरनगर लोकसभा सीट पर 2014 में 16 साल बाद खिला था कमल, फिर है कांटे की टक्कर
मुजफ्फरनगर लोकसभा सीट उत्तर प्रदेश की तीसरा लोकसभा सीट है.

नई दिल्ली: भारत में 'चीनी का कटोरा' नाम से प्रसिद्ध शहर उत्तर प्रदेश के 80 लोकसभा क्षेत्रों में से एक मुजफ्फरनगर है. ये देश की राजधानी दिल्ली के करीब होने की वजह से यूपी का सबसे विकसित और समृद्ध शहरों में से एक माना जाता है. मुजफ्फरनगर लोकसभा सीट पर कुल 10 उम्मीदवार मैदान में हैं. इस सीट पर भारतीय जनता पार्टी और गठबंधन के बीच महामुकाबला है. मुजफ्फरनगर लोकसभा सीट उत्तर प्रदेश की तीसरा लोकसभा सीट है. 41 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता वाली इस सीट पर 2013 के दंगों के बाद 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के संजीव बालियान ने करीब 4 लाख वोटों से जीत दर्ज की थी. लोकसभा चुनाव 2019 के पहले चरण के मतदान में यहां पर वोटिंग हुई. यहां से अजीत सिंह और संजीव बालियान के बीच में चुनावी जंग हैं. 

ऐसे बसा शहर
इतिहास और राजस्व प्रमाणों के मुताबिक, दिल्ली के बादशाह, शाहजहां ने सरवट (SARVAT) नाम के परगना को अपने एक सरदार सैयद मुजफ्फर खान को जागीर में दिया था, जहां पर 1633 में उसने और उसके बाद उसके बेटे मुनव्वर लश्कर खान ने मुजफ्फरनगर नाम का ये शहर बसाया. 2013 में मुजफ्फरनगर दंगों के बाद इस सीट ने राजनीतिक पार्टियां सहां सक्रीय हो गई. 2013 से पहले ये आरएलडी की गढ़ माना जाता था, लेकिन, मुजफ्फरनगर दंगों के बाद यहां बीजेपी ने पकड़ बनाई. 

क्या है जातीय समीकरण
मुजफ्फरनगर लोकसभा सीट पर 51 प्रतिशत आबादी हिंदू और 41 प्रतिशत आबादी मुस्लिम है. 2014 के लोकसभा चुनाव में 15,88,475 लोगों ने मतदान किया. मतदान में 55 प्रतिशत पुरुष और 44 प्रतिशत महिलाओं की भागेदारी रही.

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क्या है राजनीतिक इतिहास
1957 कांग्रेस के सुमत प्रसाद यहां से सांसद बने. 1967 में सीपीआई के एलए खान, 1971 में सीपीआई के विजयपाल सिंह, 1977 में बीएलडी के सईद मुर्तजा, 1980 में जेएमपी (एस) के घयूर अली खान, 1984 में कांग्रेस के धर्मवीर सिंह, 1989 में जेडी के मुफ्ती मोहम्मद सईद यहां से सांसद बने. साल 1991 से 1998 तक इस सीट पर बीजेपी का राज रहा. 199 में फिर कांग्रेस के ने इस सीट पर कब्जा किया. 2004 और 2009 में सपा और बसपा के सांसद यहां से चुने गए. 2014 में 2009 में सांसद रहे बसपा के कादीर राणा को चुनावी रण में हराकर बीजेपी के डॉ. संजीव कुमार बालियान यहां से सांसद चुने गए. 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने सपा, बसपा और कांग्रेस प्रत्याशियों को मिलाकर भी करीब दो लाख ज़्यादा वोट हासिल किए थे. तब कांग्रेस और रालोद का गठबंधन था, फिर भी इनके हिस्से सिर्फ 14.52 प्रतिशत वोट आए थे.