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बुजुर्गों और हारे हुए नेताओं की फौज से 'फ्रेश आइडिया' चाहते हैं राहुल गांधी, देखिए CWC की लिस्ट

बेहद बुरे दौर से गुजर रही कांग्रेस की थिंक टैंक टीम CWC के ज्यादातर सदस्य सक्रिय राजनीति से दूर हैं. कांग्रेस की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक कांग्रेस की CWC में कुल 25 सदस्य हैं. आइए CWC के सदस्यों पर एक नजर डालते हैं. 

कांग्रेस देश की सबसे पुरानी पार्टी है, लेकिन इसमें फ्रंट लाइन नेतृत्व के स्तर पर युवाओं की भारी कमी दिखती है.
कांग्रेस देश की सबसे पुरानी पार्टी है, लेकिन इसमें फ्रंट लाइन नेतृत्व के स्तर पर युवाओं की भारी कमी दिखती है.

नई दिल्ली: लोकसभा चुनाव 2019 का रिजल्ट आने के बाद से बीजेपी के दफ्तरों में जश्न का माहौल है, वहीं कांग्रेस दिल्ली से लेकर अलग-अलग मुख्यालयों में सन्नाटा पसरा हुआ है. रिजल्ट आने के दो दिन बाद ही कांग्रेस ने करारी हार की समीक्षा के लिए पार्टी की थिंक टैंक टीम यानी सीडब्ल्यूसी की बैठक बुला ली. कांग्रेस की पूरी कार्यप्रणाली कांग्रेस वर्किंग कमेटी (CWC) के इशारे पर चलती है. इस कमेटी के सदस्य ही पार्टी की पूरी रणनीति तैयार करते हैं. गौर करने वाली बात यह है कि बेहद बुरे दौर से गुजर रही कांग्रेस की थिंक टैंक टीम CWC के ज्यादातर सदस्य सक्रिय राजनीति से दूर हैं. कांग्रेस की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक कांग्रेस की CWC में कुल 25 सदस्य हैं. आइए CWC के सदस्यों पर एक नजर डालते हैं. 

सोनिया गांधी: एक बार फिर से उत्तर प्रदेश के रायबरेली से सांसद बनी हैं. हालांकि सोनिया साल 2014 के लोकसभा चुनाव से ही लगभग सक्रिय राजनीति से दूर हैं. 2019 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने एक भी रैली नहीं की थीं. 72 वर्षीय सोनिया के नेतृत्व में भले ही कांग्रेस केंद्र में दो बार यूपीए की सरकार बना चुकी है. करीब पांच साल से सोनिया पर्दे के पीछे रहकर ही पार्टी का काम देख रही हैं.

मनमोहन सिंह: पूर्व प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह भी CWC के सदस्य हैं. वे राज्यसभा सांसद हैं. 86 वर्षीय मनमोहन सिंह भले ही दो बार प्रधानमंत्री रहे, लेकिन वे हमेशा खुद को मुख्यधारा की राजनीति से दूर रखा. इस बार के लोकसभा चुनाव में उन्होंने एक भी रैली नहीं की.

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अहमद पटेल: सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार रहे अहमद पटेल भी लंबे समय से मुख्य धारा की राजनीति से दूर हैं. 69 वर्षीय अहमद पटेल गुजरात से आते हैं, लेकिन उनके गृह जिले में ही कांग्रेस लंबे समय से सत्ता से बाहर है. पटेल भी राज्यसभा सांसद हैं.

एके एंटनी: 78 वर्षीय केरल के पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व रक्षामंत्री एंटनी लंबे समय से मुख्य धारा की राजनीति से बाहर हैं. वे चुनाव भी नहीं लड़ते हैं. 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की हार पर उन्होंने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि कांग्रेस की छवि मुस्लिमों के तुष्टीकरण की छवि बन गई है, इससे पार्टी को बाहर लाया जाना चाहिए. लेकिन उनकी रिपोर्ट पर कोई ध्यान नहीं दिया गया.

अंबिका सोनी: ये राज्यसभा सांसद जरूर हैं, लेकिन कभी भी जनता के बीच लोकप्रिय नहीं रहीं. 76 वर्षीय अंबिका ने लंबे समय से लोकसभा या विधानसभा चुनाव भाग्य नहीं आजमाई हैं.

गुलाम नबी आजाद: जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री सक्रिय राजनीति में बने रहते हैं. कर्नाटक में सरकार बनाने में इन्होंने अहम रोल निभाया था. 70 वर्षीय गुलाम भी लंबे समय से लोकसभा चुनाव से अलग हैं. वह भी राज्यसभा के ही सदस्य हैं.

मोतीलाल वोरा: गांधी परिवार के सबसे खास लोगों में से एक हैं. 90 वर्षीय वोरा लंबे समय से राज्यसभा सांसद हैं. इन्होंने लंबे समय से ना कोई चुनाव लड़ा है और ना ही किसी राज्य में पार्टी की चुनाव जिम्मेदारी संभाली है.

मल्लिकार्जुन खड़गे: 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस ने 76 वर्षीय मल्लिकार्जुन खड़गे को लोकसभा में अपना नेता बनाया था, लेकिन इस बार वह चुनाव हार गए हैं. कर्नाटक में सरकार होने के बावजूद खड़गे वहां कांग्रेस को सीटें नहीं जितवा पाए.

अशोक गहलोत: 68 वर्षीय गहलोत राजस्थान के मुख्यमंत्री हैं, लेकिन उनके राज्य में कांग्रेस एक भी सीट नहीं जीत पाई. आलम यह रहा कि वे अपने बेटे की सीट भी नहीं बचा पाए.

केसी वेणुगोपाल: केरल से आने वाले 56 वर्षीय केसी वेणुगोपाल 2019 का लोकसभा चुनाव लड़े ही नहीं थे.

अविनाश पांडे: लंबे समय से कोई चुनाव नहीं लड़े हैं. जन नेता के रूप में इनकी कभी भी छवि नहीं रही है.

दीपक बावरिया: ये किसी भी सदन के नेता नहीं हैं. इनकी उम्र भी 60 पार है.

आनंद शर्मा: राज्यसभा सांसद हैं. इनके राज्य हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस की कारारी हार हुई है. ये राज्यसभा में भले सरकार पर आक्रामक होते हैं, लेकिन जनता के बीच इनकी लोकप्रियता नहीं है.

ओमान चांडी: 75 वर्षीय चांडी केरल के पूर्व मुख्यमंत्री हैं. पिछला विधानसभा चुनाव हारने के बाद से सक्रिय राजनीति से दूर हैं.

तरुण गोगोई: 84 वर्षीय तरुण गोगोई असम के पू्र्व मुख्यमंत्री हैं. असम में कांग्रेस की हालत बेहद खस्ता है.

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हरीश रावत: 71 वर्षीय हरीश रावत उत्तराखंड से 2019 का लोकसभा लड़े थे हार गए. इनकी अगुवाई में उत्तराखंड में कांग्रेस को विधानसभा चुनाव में भी करारी हार मिली थी. 

सिद्धारमैया: कर्नाटक विधानसभा चुनाव में जीत का दंभ भर रहे थे, लेकिन पार्टी के साथ खुद भी एक सीट से चुनाव हार गए थे. 70 वर्षीय सिद्धारमैया भी हारे हुए नेताओं लिस्ट में शामिल हैं.

कुमारी शैलजा: 56 वर्षीय हरियाणा से दलित नेता कुमारी शैलजा इस बार लोकसभा चुनाव हार गई हैं.

मुकुल वासनिक: लंबे समय से मुख्य राजनीति से दूर हैं. हालिया लोकसभा और विधानसभा चुनावों में इनकी कोई भूमिका नहीं दिखी है.

रघुवर सिंह मीणा: ये भी देश की किसी भी सदन के सदस्य नहीं हैं. राजस्थान में इस बार कांग्रेस सारी सीटें हारी हैं.

गायकंघम (Gaikhangam) : मणिपुर से आते हैं. हाल के किसी भी चुनाव में मुख्य रोल नहीं निभाया है.

ताम्रध्वज साहू: 69 वर्षीय ताम्रध्वज साहू छत्तीसगढ़ से आते हैं. इस बार पार्टी ने इन्हें टिकट नहीं दिया था. 2014 में दुर्ग से सांसद बने थे.

प्रियंका गांधी वाड्रा: 47 वर्षीय प्रियंका पहली बार सक्रिय राजनीति में उतरी हैं. लोकसभा चुनाव 2019 में पूर्वांचल में पार्टी की कमान संभाल रही थीं, लेकिन पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली है. यहां तक की उनके भाई राहुल गांधी अमेठी से चुनाव हार गए हैं. 

ज्योतिरादित्य सिंधिया: 48 वर्षीय ज्योतिरादित्य भी इस बार लोकसभा चुनाव हार गए हैं. इनके कंधों पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश की भी जिम्मेदारी थी, लेकिन यहां भी पार्टी कुछ खास नहीं कर पाई.

लुइजिन्हो फलेरियो (Luizinho Falerio): इनके कंधों पर पूर्वोत्तर में कांग्रेस को जीत दिलाने की जिम्मेदारी थी, लेकिन वे इस मिशन में पूरी तरह फेल साबित हुए. वैसे ये गोवा से आते हैं और इनकी उम्र 67 साल है.

यहां गौर करने वाली बात यह है कि राहुल गांधी को युवा होने के नाते पार्टी की कमान सौंपी गई है. राहुल लगातार अपने भाषणों में युवाओं को पार्टी से जोड़ने की बात करते हैं. वहीं कांग्रेस के लिए रणनीति बनाने वालों की लिस्ट में कोई भी युवा नहीं है. प्रियंका गांधी सहित एक-दो नेताओं को छोड़कर लगभग सारे सदस्य 60 साल पार हैं.

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