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BJP की सेंधमारी के बाद TMC विधायकों की सियासी भगदड़ पर आखिर क्‍यों खामोश हैं 'दीदी'?

मतदान से पहले छोटी-छोटी बातों पर बेहद तीखी प्रतिक्रिया देने वाली ममता बनर्जी ने इन दिनों बड़े-बड़े घटनाक्रमों पर भी खामोशी बरत रखी है. 

BJP की सेंधमारी के बाद TMC विधायकों की सियासी भगदड़ पर आखिर क्‍यों खामोश हैं 'दीदी'?
पश्चिम बंगाल की सियासत में मुख्‍यमंत्री ममता बनर्जी की खामोशी के कई सियासी मायने निकाले जा रहे हैं (फाइल फोटो)

नई दिल्‍ली: लोकसभा चुनाव 2019 में पश्चिम बंगाल की 18 संसदीय सीटों पर बीजेपी की जीत के बाद सूबे का माहौल कुछ बदला-बदला है. सबसे बड़ा बदलाव पश्चिम बंगाल की मुख्‍यमंत्री ममता बनर्जी 'दीदी' के कथित व्‍यवहार में आया है. मतदान से पहले छोटी-छोटी बातों पर बेहद तीखी प्रतिक्रिया देने वाली ममता बनर्जी इन दिनों बड़े-बड़े घटनाक्रमों पर भी खामोशी बरत रही हैं. इसका उदाहरण मंगलवार को पश्चिम बंगाल में हुए दो घटनाक्रमों में देखा जा सकता है. 

पहला घटनाक्रम, टीएमसी के दो विधायकों सहित चार दर्जन से अधिक पार्षदों के बीजेपी में शामिल होने का है. पश्चिम बंगाल में हुई इतनी बड़ी सियासी उठापटक के बाद भी दीदी कुछ नहीं बोलीं. वहीं दूसरा घटनाक्रम, पश्चिम बंगाल की सीआईडी के दफ्तर में सीबीआई की टीम पहुंचने से जुड़ा है. आपको याद होगा कि चुनाव से पहले कोलकाता के कमिश्‍नर राजीव कुमार से सीबीआई की पूछताछ के मुद्दे पर ममता बनर्जी धरने पर बैठ गई थीं. लेकिन, मंगलवार को ऐसा कुछ नहीं हुआ. 

प्रधानमंत्री के शपथ ग्रहण समारोह में होंगी शामिल
इस प्रकरण पर ममता बनर्जी भी खामोश रहीं और उनके ट‍्विटर एकाउंट से भी कोई संदेश नहीं आया. हां, मंगलवार शाम दीदी का एक बयान जरूर आया, लेकिन यह बयान इन दोनों प्रकरणों पर नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने को लेकर था. कभी नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री मानने से इंकार करने वाली ममता बनर्जी ने बेहद नरम रुख अख्तियार करते हुए कहा कि मैंने इस संबंध में दूसरे मुख्‍यमंत्रियों से बात की है. चूंकि, यह एक संवैधानिक शिष्‍टाचार है, इसलिए हमने इसमें जाने का फैसला किया है. मैं वहां जाऊंगी. 

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कहीं सियासी दांव तो नहीं ममता की खामोशी
ममता बनर्जी के इस नरम रुख और सियासी घटनाक्रमों को लेकर पश्चिम बंगाल की सियासत में कयासों का दौर शुरू हो गया है. पश्चिम बंगाल की सियासत को बारीकी से देखने वाले एक वरिष्‍ठ पत्रकार की मानें तो सूबे में इस बात के कयास लगाए जाने लगे हैं कि ममता बनर्जी की यह खामोशी और पीएम मोदी के प्रति नरम रुख कहीं आगामी विधानसभा चुनाव को ध्‍यान में रखकर चला गया सियासी दांव तो नहीं है. 

खामोशी के जरिए सहानुभूति कार्ड खेल सकती हैं दीदी
कयास इस बात को लेकर भी हैं कि ममता बनर्जी अपनी इस करारी हार के बाद पश्चिम बंगाल की जनता के बीच सहानुभूति का कार्ड खेल सकती हैं. संभव है कि ममता बनर्जी भविष्‍य में सीबीआई की कार्रवाई को आधार बनाकर सूबे की जनता से बोलें कि 'देखिए, किस तरह केंद्र सरकार हमारे खिलाफ राजनैतिक द्वेष के तहत कार्रवाई कर रही है.' ममता बनर्जी की खामोशी और नरम रुख के सियासी मायने क्‍या हैं, इसका फैसला तो अब भविष्‍य में ही होगा.

टीएमसी के दो विधायक बीजेपी में हुए शामिल
वहीं, इस बीच पश्चिम बंगाल में अप्रत्‍याशित जीत से खुश बीजेपी, ममता बनर्जी के सिपहसालारों को अपने कुनबे में शामिल करने के अभियान में जुट गई है. इसी अभियान के तहत, मंगलवार को टीएमसी के दो विधायकों सहित चार दर्जन से अधिक पार्षदों को बीजेपी की सदस्‍यता दिलाई गई. वहीं, बीजेपी के महासचिव और पश्चिम बंगाल के प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय ने यह साफ कर दिया है कि टीएमसी के विधायकों का बीजेपी में शामिल होना अभियान की पहली कड़ी है. 

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कैलाश विजयवर्गीय की टीएमसी को चुनौती
उन्‍होंने कहा कि लोकसभा चुनाव सात चरणों में हुए, उसी तरह सात चरणों में टीएमसी के विधायकों को बीजेपी में शामिल करने का कार्यक्रम होगा. कैलाश विजयवर्गीय के इस बयान को ममता बनर्जी को सीधी चुनौती के तौर पर भी देखा जा रहा है. सियासी गलियारों में कहा जा रहा है कि कैलाश विजयवर्गीय ने अपने इस बयान के जरिए ममता को सीधा संदेश देते हुए कहा है कि अपने कुनबे को बचा सकती हैं तो बचा लें, हम तो आपको विधायकों को अपने पाले में लाकर दिखाएंगे. 

पीएम ने कही थी 40 विधायकों के संपर्क में होने की बात
अपनी मजबूत स्थिति का अहसास कराते हुए कैलाश विजयवर्गीय ने यह भी कहा है कि हम टीएमसी के सभी विधायकों को बीजेपी में शामिल नहीं करेंगे. स्‍क्रीनिंग के बाद जो विधायक बीजेपी की संस्‍कृति के अनरूप होंगें, उन्‍हीं को बीजेपी की सदस्‍यता दिलाई जाएगी. उल्‍लेखनीय है कि चुनाव प्रचार के दौरान, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पश्चिम बंगाल की एक रैली के दौरान कहा था कि टीएमसी के 40 विधायक उनके संपर्क में हैं. 

मूकदर्शन बनी हैं पश्चिम बंगाल में लेफ्ट पार्टी
वहीं, बीजेपी और टीएमसी के बीच पश्चिम बंगाल में चल रही सियासी उठापटक के बीच सूबे की तीसरी शक्ति यानी लेफ्ट मूकदर्शक बनकर पूरे घटनाक्रम को देख रही है. लेफ्ट की इस स्थिति से यह अंदाजा लगाना बेहद आसान हो गया है कि वे न केवल सूबे में बेहद कमजोर हो चुके हैं, बल्कि पश्चिम बंगाल अब उनके हाथों से निकलता दिख रहा है. इस सब के बावजूद, पश्चिम बंगाल की राजनीति को जानने वाले यह भी कह रहे हैं कि हो सकता है कि यह तूफान से पहले की खामोशी हो. यदि ऐसा हुआ तो देखना दिलचस्‍प होगा कि पश्चिम बंगाल की सियासत भविष्‍य में किस करवट बैठती है.