क्या प्रियंका गांधी फ्लॉप फिल्म का हिट गाना बन सकती हैं!

कई बार ऐसा होता है कि फिल्म फ्लॉप होती है और गाने हिट हो जाते हैं. कांग्रेस यूपी में फ्लॉप है और 30 साल से हर एग्‍जाम में फेल हो रही है. इससे सवाल ये उठता है कि क्या प्रियंका गांधी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को मजबूत कर सकती हैं?

क्या प्रियंका गांधी फ्लॉप फिल्म का हिट गाना बन सकती हैं!

कई बार ऐसा होता है कि फिल्म फ्लॉप होती है और गाने हिट हो जाते हैं. कांग्रेस यूपी में फ्लॉप है और 30 साल से हर एग्‍जाम में फेल हो रही है. इससे सवाल ये उठता है कि क्या प्रियंका गांधी (Priyanka Gandhi) उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को मजबूत कर सकती हैं? क्या वो आगामी यूपी विधानसभा चुनावों के मद्देनजर 2022 में एक हिट डिलीवर कर सकती हैं? ये सवाल हर कांग्रेसी के दिल में है. सच ये है कि ये काम मुश्किल ही नहीं नामुमकिन दिखाई पड़ता है.

कांग्रेस के पास ना कार्यकर्ता हैं, ना संगठन है, ना नेता हैं और ना ही कोई नारा है जिसके अड़ोस-पड़ोस पार्टी को खड़ा किया जा सके. कांग्रेस का वोट बैंक भी सिंगल डिजिट में है. कांग्रेस के नेताओं की एक-दूसरे से बनती नहीं है. दिक्कत एक और भी है कि कांग्रेस सीएए के बहाने मीडिया में हेडलाइन तो बटोर रही है लेकिन उत्तर प्रदेश जैसे राज्य के चुनाव में इसका फायदा मिलना मुश्किल है.

ये भी हो सकता है कि मुसलमान वर्ग जो आज नाराज़ है वो अगले विधानसभा चुनाव में सपा की झोली में वोट डाल दे और कांग्रेस के पास केवल हमदर्दी ही आए. अगर प्रियंका के राजनीतिक जीवन का ब्यौरा लें तो उन्होंने अभी तक बहुत कुछ हासिल नहीं किया है.

2019 के लोकसभा चुनाव में उनकी गेस्ट अपीयरेंस फ्लॉप रही थी. कांग्रेस पार्टी अमेठी तक हार गई. ये मानिए कि प्रियंका गांधी को विरासत में कांग्रेस से कुछ नहीं मिला. उनके पास केवल एक हारी, टूटी और थकी हुई पार्टी है. इसके ऊपर गांधी परिवार का गढ़ अमेठी भी टूट चुका है और किले के नाम पर केवल रायबरेली ही बचा है. प्रियंका गांधी के पास आज केवल उनका आत्मविश्वास और साहस ही है.

इस परिस्थिति में ये कहना कोई छोटी बात नहीं होगी कि कोई और नेता होता तो इतना काम भी नहीं कर पाता जो प्रियंका गांधी आज करने की कोशिश कर रही हैं. लोकसभा चुनाव के बाद एक शब्द का इस्तेमाल किया जा सकता था कांग्रेस पार्टी के लिए और वह है- किंकर्तव्यविमूढ़. प्रियंका ने इसको तोड़ दिया. प्रियंका सही वक्त पर सही मुद्दे पकड़ने की कोशिश कर रही हैं.

लेकिन उनको एक बात का ध्यान रखना होगा कि उत्तर प्रदेश में वोट आज भी धर्म और जाति के नाम पर पड़ता है. इस राजनीतिक माहौल को बीजेपी को फायदा हो सकता है. इस ध्रुवीकरण से बीजेपी का वोट बैंक बढ़ भी सकता है. प्रियंका गांधी को इससे बचना होगा. मेजॉरिटी और माइनॉरिटी का मुद्दा उन्हें महंगा भी पड़ सकता है इसीलिए उनको वही मुद्दे उठाने चाहिए जिससे कांग्रेस पार्टी को फायदा हो ना कि वामपंथी दलों की राजनीति को.

पब्लिसिटी बनाम मुद्दे
प्रियंका को एक और चीज करनी होगी. हर उत्तर प्रदेश के दौरे में पब्लिसिटी उनके उठाए मुद्दों को मिलनी चाहिए ना कि उनको. ये गलती राहुल गांधी ने 15 साल तक की. मुद्दों पर कम फोकस रहा और उन पर ज्यादा. लखनऊ की प्रेस कांफ्रेस में प्रियंका ने सूझबूझ का परिचय दिया. उन्होंने अपनी सुरक्षा के मसले को प्रेस कांफ्रेस पर हावी नहीं होने दिया. उनका सारा फोकस योगी आदित्यनाथ, पुलिस फायरिंग और मानवाधिकार से जुड़े मुद्दों पर रहा.

गांधी परिवार को समझना होगा कि मीडिया का उन पर ज्यादा फोकस होने से कांग्रेस पार्टी को नुकसान होता है. छत्तीसगढ़ और झारखण्ड में जहां मुद्दों पर ज्यादा फोकस रहा, उन दोनों जगह कांग्रेस ने सरकार बनाई.

इसके अलावा उन्हें उत्तर प्रदेश में लगातार रहना भी होगा. केवल किराए पर घर लेना काफी नहीं होगा. प्रदेश में ये संदेश देना पड़ेगा कि आप सुबह उठकर लखनऊ में प्रियंका से चाय पर मिल सकते हैं. जरूरी हो तो उनको मुख्यमंत्री का चेहरा भी बनना पड़ेगा नहीं तो लोग उन्हें राहुल गांधी जैसे ही पॉलिटिकल टूरिस्ट की तरह से देखने लगेंगे. मुझे लगता है कि प्रियंका ये सब कर सकती हैं. अगर वो समझ लें कि उनके अलावा यूपी में कोई विकल्प ही नहीं है. उनके अलावा यूपी में कांग्रेस के पास दूसरा कोई बड़ा नेता नहीं है.

बीजेपी 15 साल बाद यूपी में जीती...
बीजेपी यूपी में 15 साल बाद सत्ता में आई, 35 साल बाद ममता ने बंगाल में लेफ्ट को हराया ऐसा कांग्रेस भी यूपी में कर सकती है. पर एक चीज समझनी होगी कि केवल आठ राज्य हैं जहां बीजेपी और कांग्रेस आमने-सामने हैं. बाकी हर राज्य में बीजेपी प्रमुख पार्टी है और बाकी सभी पार्टियां दूसरे छोर पर खड़ीं हैं. कांग्रेस कहीं दूसरे, तीसरे या चौथे नंबर पर है- जैसे महाराष्ट्र. इसीलिए प्रियंका को मुद्दों की राजनीति करनी पड़ेगी ना कि टीवी पर दिये गए बयानों की.

दुनिया भर में टेक्नोलॉजी के माध्यम से पिछले 10 साल में धरने प्रदर्शन हुए. चाहे वो मिस्र में तहरीर स्क्वायर हो, ईरान हो या ट्यूनीशिया. सब जगह कुछ वक्त के लिए सरकार को लोगों की बात माननी ही पड़ी लेकिन इससे ना तो समाज की व्यवस्था पर कोई फर्क पड़ा और ना ही राजनीतिक प्रक्रिया पर. सीएए के साथ भी कुछ ऐसा ही हो सकता है कि ये जेपी का आंदोलन नहीं है जो इंदिरा के खिलाफ था. इस पर मैं अलग से लिखूंगा कि कैसे सीएए और जेपी का आंदोलन दो अलग चीजें हैं पर फिलहाल प्रियंका अगर उत्तर प्रदेश में डटी रहें और अपनी खाटी कांग्रेसी राजनीति करें तो वो एक फ्लॉप फिल्म का हिट गाना जरूर बन जाएंगी.

(लेखक: कार्तिकेय शर्मा WION के राजनीतिक संपादक हैं)

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)