मध्यप्रदेशः स्थानीय निकायों की राजनीति महत्वहीन क्यों है?

विधानसभा-2018 में मुख्य रूप से राज्य स्तर की राजनीति का अहसास हमें होता है, किन्तु 15 साल सत्ता रहने के बाद भी भाजपा ने जिस तरह से अपनी उपस्थिति को बरकरार रखा और बराबरी की टक्कर दी, उससे यह स्पष्ट हो जाता है कि कांग्रेस की जमीनी ताकत अभी बहुत कमज़ोर है. 

मध्यप्रदेशः स्थानीय निकायों की राजनीति महत्वहीन क्यों है?

विधानसभा-लोकसभा चुनाव और उनके परिणाम सदैव चर्चा में रहते हैं. किन्तु विधानसभा और लोकसभा चुनाव के दिखने वाले परिणामों की भूमिका तय करने वाले स्थानीय निकायों यानी ग्राम पंचायत, जनपद पंचायत, जिला पंचायत, नगर परिषद, नगर पालिका और नगर निगम के चुनावों को बहुत कम तवज्जो दी जाती है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हमारे यहाँ स्थानीय निकायों को संवैधानिक मान्यता और संवैधानिक भूमिका होने के बावजूद भी राज्य व्यवस्था ने इन्हें पूर्ण रूप से सक्रिय और विकसित होने का मौका नहीं दिया. बेहतर राजनीतिक व्यवस्था के लिए जरूरी है कि राज्य या राष्ट्र स्तर की राजनीति करने से पहले गाँव और नगरीय निकायों के स्तर की राजनीति की जाए.

चुनावी सियासत में वंशवाद या परिवारवाद इसीलिए चुनौतीपूर्ण है क्योंकि बड़े नेताओं से लेकर स्थानीय विधायकों तक के परिजन स्थानीय निकाय के चुनाव भी नहीं लड़ते हैं, और सीधे विधानसभा में पहुंचना चाहते हैं. इससे न् केवल वे वास्तविकताओं से कटे हुए रहते हैं, बल्कि स्थानीय निकाय स्तर का नेतृत्व यह मानने लगता है कि उसके लिए आगे की राजनीति में अवसर नहीं होने वाले हैं.

मध्यप्रदेश के विधानसभा चुनाव 11-12 दिसंबर 2018 को परिणाम आने के बाद भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बीच हृदय की धडकनों को रोक देने वाली टक्कर के बाद चर्चा में रहे. इसका एक जोड़ आने वाले लोकसभा चुनावों के साथ देखा जा रहा है क्योंकि भारत के हिन्दी प्रांत में भारतीय जनता पार्टी का विस्तार चरम तक पंहुचने के बाद ढलान पर माना जाने लगा है. हर कोई यह कह रहा है कि इन हालिया चुनावों से लोकसभा का स्वरुप भी तय होगा. लेकिन मध्यप्रदेश के सन्दर्भ में केवल 2019 नहीं, बल्कि वर्ष 2020 बहुत महत्वपूर्ण होगा. जनवरी 2020 में मध्यप्रदेश की 22607 पंचायतों, 313 जनपद पंचायतों, 52 जिला पंचायतों और 300 नगरीय निकायों (मध्यप्रदेश में कुल 378 नगरीय निकाय है) के चुनाव भी होंगे.

विधानसभा-2018 में मुख्य रूप से राज्य स्तर की राजनीति का अहसास हमें होता है, किन्तु 15 साल सत्ता रहने के बाद भी भाजपा ने जिस तरह से अपनी उपस्थिति को बरकरार रखा और बराबरी की टक्कर दी, उससे यह स्पष्ट हो जाता है कि कांग्रेस की जमीनी ताकत अभी बहुत कमज़ोर है. मध्यप्रदेश के तीन चौथाई स्थानीय निकाय अब भी भारतीय जनता पार्टी के पास हैं, और यह तय है कि उनके पास इन्हें बरकरार रखने के अवसर भी हैं. ऐसे में यदि वास्तव में कांग्रेस को अपनी जमीन तैयार करना है तो उसे ग्रामीण और शहरी स्थानीय निकायों को भी उतना ही महत्व देना होगा, जितना वह लोकसभा और विधानसभा को देती है. वास्तव में कांग्रेस को अपनी विचारधारा को स्थापित करने के लिए जमीनी स्तर पर संगठन को मज़बूत करना होगा और इसकी मजबूती की परीक्षा वर्ष 2019 के जनवरी माह में होने वाले चुनावों में हो ही जायेगी.

स्थानीय निकायों का वर्तमान राजनीतिक स्वरुप
वर्ष 2015 के 22604 ग्राम पंचायतों के चुनाव हुए थे, इनमें 15781 सरपंच भाजपा समर्थित माने गए थे. यह जानना जरूरी है कि भाजपा ने अपनी जड़ों को मज़बूत करने के लिए राज्य तंत्र के जरिये गाँव-गाँव के स्तर पर संघ और हिंदूवादी गतिविधियों का विस्तार किया था. इसमें उसी जन अभियान परिषद का इस्तेमाल किया गया, जिसका गठन 1997-98 में कांग्रेस सरकार ने ग्राम पंचायतों और सामाजिक अभियान संचालित करने के लिए किया था.

चूंकि कांग्रेस ने सत्ता में रहते हुए 73वें और 74वें संविधान संशोधन को लागू किया था, इसलिए ऐसी उम्मीद की जा रही है कि एक बार फिर से सत्ता में आने के बाद मध्यप्रदेश में वह स्थानीय निकायों को मज़बूत बनाएगी. भाजपा ने ग्राम पंचायतों को पूरी तरह से नौकरशाही के अधीन कर दिया था. वर्ष 2015 के ग्राम पंचायत के चुनावों में 360892 पंचों के लिए भी चुनाव हुए थे, किन्तु आश्चर्य इस बात का है कि इतने पदों के लिए कुल 226488 उम्मीदवार ही चुनाव में खड़े हुए, यानी एक पद के लिए 0.62 उम्मीदवार. जबकि एक सरपंच पद के लिए 6.21 उम्मीदवार मैदान में थे. आशय यह है कि एक तरफ तो सरपंच स्थानीय स्तर पर सत्ता का केंद्र बन रहा है, किन्तु दूसरी तरफ अफसरशाही उसे अपने नियंत्रण में रखने के लिए तत्पर है. इसका उदाहरण दिस्मबर 2016 से मध्यप्रदेश में शुरू हुई सरपंचों की राज्य व्यापी हड़ताल में दिखाई दिया, जब सरपंचों राज्य सरकार के खिलाफ़ मोर्चा खोल दिया.

विकेन्द्रीकृत व्यवस्था में आरक्षण वास्तव में एक महत्वपूर्ण पहलू है. मध्यप्रदेश में 22607 सरपंचों में से 3248 सनुसूचित जाति के लिए, 7812 अनुसूचित जनजाति के लिए, 4076 अन्य पिछडा वर्ग के लिए और आधे पद महिलाओं के लिए आरक्षित होते हैं. वर्ष 2015 में 22607 सरपंच पदों में से 14178 पर महिलायें निर्वाचित हुई थीं.

जनवरी, 2015 में हुए चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने इंदौर, भोपाल, जबलपुर, छिंदवाडा नगर निगम पर कब्ज़ा जमाया था. यह उल्लेखनीय है कि कमलनाथ के प्रभाव वाले छिंदवाडा की नगर निगम परिषद भी भाजपा के कब्ज़े में चली गई थी. वर्ष 2003 के बाद मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव जीतने के बाद भाजपा लगातार थानीय निकायों पर भी नियंत्रण स्थापित करती चली गई थी. और कांग्रेस ने 2003 की हार के बाद स्थानीय निकायों पर 12 सालों तक कोई जोर ही नहीं लगाया.

इसके बाद अगस्त-सितम्बर 2015 में भाजपा ने 8 नगरीय निकायों के चुनाव जीते, तो कांग्रेस एक में ही जीत दर्ज कर पायी. व्यावसायिक परीक्षा मंडल का घोटाला बाहर आने के बाद भी भाजपा ने विजय हासिल की और मध्यप्रदेश में पहली बार प्रदेश की सभी 16 कार्पोरेशंस पर भारतीय जनता पार्टी का कब्ज़ा हो गया था.

इसके बाद अगस्त 2017 में हुए स्थानीय निकायों के चुनावों में 43 निकायों के अध्यक्ष पदों में से 25 भाजपा को मिले थे और कांग्रेस को मात्र 15 पद हासिल हुए थे. 2017 के इन चुनावों को मध्यप्रदेश विधान सभा चुनावों का पूर्व-परीक्षण माना जा रहा था.

इसके बाद जनवरी 2018 में हुए 19 स्थानीय निकायों के चुनावों में स्थिति थोड़ी बदली, जब कांग्रेस और भाजपा दोनों ने ही 9-9 निकायों पर कब्ज़ा स्थापित किया. कांग्रेस ने इसी के साथ मालवा-निमाड में अपनी मौजूदगी दर्जकरवाई थी. सन्दर्भ के लिए उल्लेख है कि इसी वक्त दिग्विजय सिंह 3300 किलोमीटर लंबी नर्मदा परिक्रमा पर निकले हुए थे.

राजनीतिक पहलू
यह समझना होगा कि मैदानी कार्यकर्ताओं से रिश्ता बनाए रखने के लिए स्थानीय निकायों के स्तर पर कांग्रेस का मज़बूत होना बहुत जरूरी है. और स्थानीय निकायों में अपनी मौजूदगी बनाने के लिए कार्यकर्ताओं की सकारात्मक सक्रियता बहुत जरूरी है. हाल के विधानसभा चुनावों ने यह साबित कर दिया है कि मतदाता अब यह देखने लगा है कि उनके क्षेत्र से चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार की छवि कैसी है? कहीं वह हिंसक, अभिमान और खराब व्यवहार का व्यक्ति तो नहीं है? कहीं उसका दल गुंडागर्दी और धमकी-वसूली के पेशे में तो नहीं है? यह बात कोई राजनीति शास्त्र का विषय नहीं है, जरा गौर से देख लीजिए कि विधानसभा चुनावों में कांग्रेस और भाजपा, दोनों ही दलों के ऐसे ज्यादातर उम्मीदवार, मंत्री और मंत्री पद के उम्मीदवार चुनाव हार गए हैं, जिनका व्यवहार खराब था, जो अभिमान हो गए थे और लोगों की पंहुच में नहीं थे. किसी भी व्यक्ति और राजनीतिक दल की छवि का निर्माण स्थनीय निकायों के स्तर से ही होता है क्योंकि सामाजिक सुरक्षा पेंशन योजना, पेयजल की व्यवस्था, जाति प्रमाण बनवाने, मनरेगा और वन अधिकार क़ानून के क्रियान्वयन से लेकर गौण खनिजों के उत्खनन तक के काम पंचायतों के पास ही हैं.

लोक अधिकार और स्थानीय निकाय
वर्ष 2005-06 में बनाया गया राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी क़ानून ग्राम पंचायतों को विकास की योजना बनाने, आर्थिक संसाधन उपलब्ध करवाने और समाज की रोज़गार की दिक्कतों से निपटने का महत्वपूर्ण कार्यक्रम बना था, किन्तु आज के हालात यह हैं कि मनरेगा की छवि और क्रियान्वयन की स्थिति इतनी खराब कर दी गई है कि लोग सरकार पर विश्वास नहीं करना चाहते हैं और इस योजना के तहत काम नहीं करना चाहते हैं. वर्ष 2014 से 2018 तक केंद्र सरकार ने इसके लिए 15726 करोड़ रूपए आवंटित किये, किन्तु राज्य सरकार ने इसके लिए अपना हिस्सा खर्च नहीं किया. इसका परिणाम यह हुआ कि मनरेगा के तहत शुरू होने वाले काम अधूरे रहते गए और मजदूर का भुगतान भी नहीं हुआ. वर्ष 2014 में मनरेगा के 98 प्रतिशत काम पूरे हो रहे थे, जो घटते घटते पिछले साल 62 प्रतिशत पर आ गए. मध्यप्रदेश सरकार ने मनरेगा में सामाजिक अंकेक्षण पर ऐसे काम किया कि कभी सही तरीके से सामाजिक अंकेक्षण हो ही न पाया.

इसी तरह मध्यप्रदेश में वन अधिकार क़ानून के क्रियान्वयन की स्थिति भी बहुत बुरी है. राज्य में सवा चार लाख आदिवासी परिवारों के दावों में से 2 लाख दावे तो खारिज ही कर दिए. इसके साथ ही 1.54 लाख अनुसूचित जाति, पिछडा वर्ग के परिवारों ने भी दावे किये थे, उनमें से 1.50 लाख दावे खारिज कर दिए. इन सभी दावों को ग्राम सभा–वन अधिकार समिति ने मान्यता दी थी.

गौ-माता के नाम पर पूरे देश में खूब हल्ला मचाया जा रहा है, पर आंकड़े क्या बताते हैं? मध्यप्रदेश सरकार की अपनी रिपोर्ट बताती है कि मध्यप्रदेश में गौ-पशुओं की संख्या में भारी कमी आई है. वर्ष 2008 में मध्यप्रदेश में 2.19 करोड़ गौ पशु थे, जो वर्ष 2012-13 में घटकर 1.96 करोड़ रह गए. यानी भाजपा के शासनकाल में 23.13 लाख गौ-पशु खतम हो गए. भैंसों की संख्या 91.29 लाख से कम होकर 81.87 लाख रह गई. सभी तरह के पशुधन में 43.62 लाख की कमी आई है.

मध्यप्रदेश को स्थानीय अर्थव्यवस्था को बेहतर करने के लिए विकास को नए नज़रिए से देखना होगा, क्योंकि जानकारी यह है कि राज्य में विकास ने देशी प्रजातियों को खतम करने का काम किया है. मध्यप्रदेश में 26.79 लाख देशी प्रजाति के पशु खतम हो गए. यह स्थानीय निकायों और स्थानीय अर्थव्यवस्था के बीच बढ़ती दूरी का संकेत है.

बेहतर स्थानीय निकायों के साथ जुड़ने के लिए जरूरी होगा कि जिन 36 बिंदुओं का उल्लेख कांग्रेस के वचन पत्र (पंचायतों को आर्थिक संसाधन, ग्राम न्यायालय की स्थापना, सार्वजनिक प्रयोजनों के लिए भूमि आवंटन, स्थानीय निकायों के अपने साझा कार्यालय होना, राज्य वित्त आयोग से ज्यादा राशि उपलब्ध करवाना और प्रशिक्षण संस्थानों को बेहतर करना आदि शामिल हैं) में है, उसे लागू करने के लिए एक स्पष्ट कार्ययोजना बनायी जाए, क्योंकि ये बिंदु यह टुकड़े टुकड़े में लागू नहीं हो सकते हैं. मकसद यही होना चाहिए कि स्थानीय निकायों के पास संसाधन हों, उन्हें अपना काम करने का अधिकार और मानव संसाधन हों; और इन सबके साथ पारदर्शिता और जवाबदेयता भी हो.

वास्तव में कांग्रेस को स्वशासन की व्यवस्था को स्व के अनुशासन के साथ जोड़ना होगा. राज्य शासन की जिम्मेदारी निभाते हुए उन्हें देखना होगा कि स्थानीय निकाय विकेन्द्रीकरण की मूल भावना के साथ काम करने में सक्षम हो पायें और एक राजनीतिक दल के रूप में उनके कार्यकर्ताओं और नेतृत्व में यह समझ हो कि सत्ता में होने का मतलब केवल विधानसभा और लोकसभा में ही बहुमत में होना नहीं है, इसके लिए जरूरी है कि उनका स्थानीय निकायों के स्तर पर सक्रिय होना, समाज को स्थानीय निकाय से जोड़ना और विनम्रता के साथ समाज-सरकार के बीच जुड़ाव के लिए काम करना.

(लेखक विकास संवाद के निदेशक, लेखक, शोधकर्ता और अशोका फेलो हैं.)

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)