महिला दिवस: विजयगीत गाने से पहले विजयगीत कमाने होते हैं
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महिला दिवस: विजयगीत गाने से पहले विजयगीत कमाने होते हैं

हम महिला दिवस मनाते हुये उन सख़्त धार्मिक और सामाजिक रूप से क्रूर रिवाजों के नीचे दबे हैं जो पितृसत्ता की पोषक और स्त्री की शोषक हैं. कितने सारे अंधविश्वास, पाखंड और कर्मकांड महिलाओं ने ख़ुशी-ख़ुशी अपने ऊपर लाद लिये हैं.

महिला दिवस: विजयगीत गाने से पहले विजयगीत कमाने होते हैं

हम तो अब तक यही मानते आये हैं कि दिवस उन के मनाये जाते हैं जो कमज़ोर माने जाते हैं, जैसे हिन्दी दिवस, मज़दूर दिवस, दिव्यांग दिवस लेकिन बिलकुल ही ऐसा नहीं है क्योंकि दिवस सम्मान देने के लिये भी मनाये जाते हैं और जागरूकता बढ़ाने के लिये भी दिवसों का समायोजन किया जाता है जैसे डॉक्टर्स डे, मदर्स डे, डॉटर्स डे आदि.

महिला दिवस यानि विमेंस डे हमारे देश का अभियान नहीं ,यह तब आरम्भ हुआ जब विदेश में महिलाओं को वोट देने का अधिकार मिला जो हमारे देश के संविधान में पहले से ही था. विदेश से ही यह दिवस भारत में भी आया जो भारतीय महिलाओं पर लदी तमाम तरह की सख़्त पाबंदियों से जोड़ दिया गया, यह ज़रूरी भी था. आज हम स्त्रियों की सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक स्थितियों पर सुधार की पुरज़ोर माँग करते हैं, यह इस समय की माँग है इसलिये यह जायज़ भी है क्योंकि सिर्फ़ वोट की हक़दार हो जाने से आज़ादी का बिगुल जरूर बजाया जा सकता है लेकिन सच्ची स्वतंत्रता का अनुभव नहीं हो सकता क्योंकि हकदारी जब तक ज़मीनी हक़ीक़त नहीं बनती तब तक उस हकदारी का कोई मतलब नहीं.

प्रेम और प्रेम दिवस!

हमारे देश की ज़्यादातर महिलायें तो आज तक अपनी मनमर्ज़ी से वोट भी नहीं देतीं. उनको अपने घर परिवार के पुरुषों के इशारे पर अपना मत अलां फ़लाँ को देना होता है. इसका कारण यह है कि भारतीय महिलाओं का रुझान राजनैतिक हलचलों की ओर कम से कम रहता है तभी तो वे अगर चुनाव में भागीदारी भी करती हैं तो अपने पिता, पति या पुत्र की इच्छा और रज़ामन्दी पर.

इसी का परिणाम है कि हमारे यहाँ विधान सभाओं और लोकसभा में स्त्रियों का मुखर और प्रखर स्वर पुरुषों के मुक़ाबले अक्सर सुनाई नहीं देता.जबकि यहाँ महिलाओं को राजनैतिक अधिकारों की बात बराबर पुरज़ोर तरीक़े से उठानी चाहिये. स्त्री के प्रति लगातार होते धोखेबाजी के मामलों, अनाचारों और अत्याचारों पर जबाव माँगने चाहिये और इन मुद्दों पर कार्रवाई का हिसाब पूछना चाहिये .यहाँ स्त्री आवाज़ें बहुत हल्की और धीमी हैं.

ज़माने ज़माने की बात

हम महिला दिवस मनाते हुये उन सख़्त धार्मिक और सामाजिक रूप से क्रूर रिवाजों के नीचे दबे हैं जो पितृसत्ता की पोषक और स्त्री की शोषक हैं. कितने सारे अंधविश्वास, पाखंड और कर्मकांड महिलाओं ने ख़ुशी-ख़ुशी अपने ऊपर लाद लिये हैं. यह ज़रूरी तौर पर मान लिया है कि यदि स्त्री के जीवन में पुरुष का वजूद शामिल नहीं है तो उस से ज़्यादा अभागा कोई नहीं, वह अपशकुनी और अधूरी है. इसलिये सारे कठिन से कठिन व्रत उपवास पुरुषों के लिये करते हुये हम महिलायें अपनी ज़िन्दगी की ख़ैर मनाते रहते हैं. जिस देश में सौभाग्यवती और पुत्रवती भव के आशीर्वाद फल फूल रहे हों वहां हमारा महिला दिवस का झंडा लहराना क्या प्रमाणित करता है?

मैं प्रेमचन्द की धनिया...

मेरा कहना है कि जब तक रूढ़ियों की बाड़ें रहेंगी तब तक स्त्री की आज़ादी का गीत गाना ढोंग हैं, पाखंड है. मैं यह भी तय कर चुकी हूँ कि ये बाड़ें हमें लांघनी नहीं, काटनी नहीं, उखाडनी हैं ताकि इनकी जड़ ही न रहें. करवाचौथ के जश्न में डूबी आज की जींस और छोटे टॉप वाली स्त्री पीढ़ी क्या कपड़ों के ज़रिये आज़ादी का ढोंग नहीं रच रही? क्या सचमुच स्त्री की स्वतंत्रता कपड़ों के रास्ते आयेगी? विचारों की संवृद्धि के मायने कपड़ों की आधुनिकता में नहीं खोजी जा सकती और न महिला दिवस का जश्न किया जा सकता है. अगर हम यह तमाशा करते आ रहे हैं तो ज़रा ठहरकर सोचना चाहिये कि हम अपनी हकदारियों के साथ कितने आगे बढ़े हैं? या हम अपने ही साथ धोखेबाज़ी कर रहे हैं. किसी दिवास्वप्न में जीते हुये ख़ुश हैं.

नीरज के गीतों ने प्यार सिखाया, तब मैं छोटी लड़की थी...

क़दम दर क़दम आगे बढ़ने के लिये गम्भीरता चाहिये और धैर्य तथा संयम भी. हम बेशक ख़ुश हो सकते हैं कि साल में एक दिन महिला दिवस मनाये जाने की रस्म है और महिलायें इस दिन को उत्सव के रूप में भरपूर उमंग के साथ मनाती भी हैं. मगर यह भी मानना होगा कि यह महज़ शहरी उत्सव होकर रह जाता है. सत्तर प्रतिशत ग्रामीण आबादी में शामिल महिलायें महिला दिवस के बारे में नहीं जानतीं और न महिला दिवस मनातीं जबकि कि उनको भी इस बारे में ज्ञान का हक़ बनता है और यह भी जानना उनके हक़ में होगा कि वे भी अंधविश्वासों से दूरी बनाकर रहें. वे भी पाखंड और कर्मकांडों की थोथी खोखली असलियत को समझें. वे यह समझें कि उनकी ज़िन्दगी कैसे कैसे ख़तरनाक जालों में बाँधकर रखी गयी है.

अत: यहाँ ज़मीनी बदलाव ज़रूरी है, पताका लहराने से हमारी आज़ादी मुकम्मल नहीं होती. जितने भी अधिकार मिले हैं उनका क्रियान्वयन होना चाहिये, इस मुद्दे पर स्त्रियों को ही आगे आना होगा भले ही अपने घर परिवार में अपनी कडुवी मगर ईमानदार बात रखनी पड़े या समझाने का उपक्रम अपनाना पड़े. विजयगीत गाने से पहले विजयगीत कमाने होते हैं. इसलिये ही यह ज़रूरी है कि हम महिला दिवस मनाने के लिये बराबर सच्ची आज़ादी के लिये प्रयत्नरत रहें और इस दिन को साल दर साल सुनहरा बनाते जायें.

(लेखिका वरिष्ठ साहित्यकार हैं)

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)

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