स्मृति : राजकपूर, कादंबरी और आनंद रघुनंदन

एक शायर ने कहा है- आज यह बेजार है तो कल यहीं बाजार होगी. इसीलिए कहा जाता है कि घूरे के दिन भी फिरते हैं और सभ्यताएं चरम पर पहुंचकर फिर घूरे में तब्दील हो जाती हैं.

स्मृति : राजकपूर, कादंबरी और आनंद रघुनंदन

वक्त की रफ्तार के साथ इन पिछले पंद्रह दिनों में बहुत कुछ हो गया. प्रणब मुखर्जी नागपुर जाकर संघ के दीक्षांत समारोह में बोल आए, मीडिया की अपेक्षा के विपरीत कोई राजनीतिक वज्रपात नहीं हुआ. रामजान में सीजफायर और पत्थरबाजों को गुमराह बेटे करार देने के बाद भी न सीमापार से मोर्टार के गोले रुके न ही पत्थरबाजों का आचरण बदला. कुछ और सैनिक शहीद हुए, कुछ और घर उजड़े. एक अखबार नवीस को अपनी जान खोनी पड़ी.

उधर एक दूसरे को कच्चा चबा जाने की धमकी देने वाले अमेरिका और उत्तर कोरिया सिंगापुर में एक ही डाइनिंग टेबल में बैठे और शांति के साथ लंच किया. दूसरों को तनाव मुक्त जीवन जीने का उपदेश देने वाले इंदौर में एक संत भैय्यूजी महाराज ने तनाव में आकर खुद गोली मारकर मीडिया को महीने भर का मसाला दे गए. 

भोपाल की फिजा में कुछ और राजनीतिक कटुता घुली. प्री-मॉनसून के साथ बयानों के बादल गरजे और रुक-रुककर चुनाव पूर्व घोषणाओं की बारिश हुई. इन सबके बावजूद दुनिया की गति नहीं बदली, पृथ्वी पूर्व की भांति अपनी धुरी पर घूमती रही.

अपनी "सोच" से बाहर निकलिए

शेक्सपियर दुनिया को एक रंगमंच मानते थे. सभी यहां पूर्व से तय अपने-अपने हिस्से का अभिनय करते हैं और अंततः पटाक्षेप के साथ दूसरा एपीसोड शुरू हो जाता है. ये दुनिया अंतहीन एपीसोडों का एक दिलचस्प सोप-ओपेरा है.

राजकपूर ने इसी थीम को अपनी फिल्म "मेरा नाम जोकर में रखा". जोकर को मां के मरने की खबर सर्कस में खेल दिखाते और दर्शकों को हंसाते समय मिलती है. जगत का दस्तूर है "शो मस्ट गो ऑन", जोकर अपना काम जारी रखता है. दुनिया की गति और नियति में किसी के जीने-मरने, हारने-जीतने से कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन यह अंतिम नहीं होता. सृष्टि में न कोई जन्मता है न मरता है, वह रूपांतरित होता है.

एक शायर ने कहा है- आज यह बेजार है तो कल यहीं बाजार होगी. इसीलिए कहा जाता है कि घूरे के दिन भी फिरते हैं और सभ्यताएं चरम पर पहुंचकर फिर घूरे में तब्दील हो जाती हैं. उत्थान और पतन दोनों की रिसाइक्लिंग होती है. इसके बीच की संधि को ही संक्रमण काल कहा जाता है. अपना विंध्य इन दिनों इसी संक्रमण काल से गुजर रहा है सांस्कृतिक तौर पर और भौतिक उत्थान के तौर पर भी.

बढ़ता ही जा रहा है धरती माता का बुखार

इसी 2 जून को रीवा में एक शानदार ऑडिटोरियम का लोकार्पण हुआ. यह कृष्णा राजकपूर के नाम समर्पित है. इसके पीछे की कहानी यह है कि कृषणा जी का जन्म यहीं रीवा में जिस बंगले में हुआ, वहीं राजकपूर की बारात आई थी और अब वहीं इस विशाल ऑडिटोरियम का निर्माण किया गया है.

कृष्णा जी के पिता करतारनाथ मलहोत्रा स्वतंत्रता पूर्व तक रीवा राज्य के पुलिस प्रमुख रहे. राजकपूर पहली बार अपने पिता पृथ्वीराज कपूर की नाटक कंपनी के साथ यहां आए थे. पृथ्वीराज जी तब घूम-घूमकर अपने नाटकों का प्रदर्शन करते थे यहां उन्होंने अपनी कंपनी के नाटक 'पठान' का मंचन किया था. बाद में वे जब मुंबई में जमे तो उनके बेटे राजकपूर की दोस्ती करतारनाथ के बेटे प्रेमनाथ के साथ हो गई.

Opinion : फिलहाल कांग्रेस की गति और नियति 

प्रेमनाथ का यह फिल्मों में प्रवेशकाल था. राजकपूर दोबारा प्रेमनाथ के साथ रीवा घूमने आए. जयप्रकाश चौकसे लिखते हैं कि, सफेद साड़ी पहने वीणा बजाती सोलह वर्षीय कृष्णा को देखते ही वे अपना दिल दे बैठे. कृष्णा जी तब इंटर की परीक्षा मैरिट में पास की थी. तीसरी बार राजकपूर की बारात आई और कृष्णा राजकपूर के साथ बॉलीवुड का हिस्सा बन गईं. इस बीच कई वर्षों तक कपूर परिवार का रीवा आना-जाना बना रहा.

शम्मी कपूर ने एक दिलचस्प वीडियो इंटरव्यू में बताया था कि उन्होंने तैराकी और घुड़सवारी रीवा में ही सीखी. शशि कपूर की यादों में भी रीवा बसा रहा. ये दोनों ही परम भाभी भक्त थे. 1953 में सुमधुर संगीतों से सजी एक फिल्म आई थी "आह" यह एक भावपूर्ण प्रेमकथा है जिसके क्लाइमेक्स में रीवा है. राजकपूर का रीवा से कितना गहरा भावनात्मक रिश्ता था यह जानने के लिए "आह" फिल्म को जरूर देखिए. कृष्णा-राजकपूर दंपति ने अपनी बेटी का नाम ही रीमा रख दिया. रीमा ही रीवा का वास्तविक व प्राचीन नाम है.

Opinion : इस पाखंड पुराण से देश का भला होने वाला नहीं

12 मई 1946 को शादी होने के बाद 2 जून 2018 यानी 72 साल बाद इस स्मृति को स्थायित्व मिला. दो जून को राजकपूर की पुण्यतिथि होती है, यह एक भावपूर्ण और ऐतिहासिक श्रद्धांजलि थी. इसका श्रेय प्रदेश सरकार के मंत्री राजेंद्र शुक्ल को जाता है. आज ब्रांडिंग का जमाना है. रीवा राजकपूर के साथ उसी तरह चस्पा हो गया है जैसे कि लता मंगेशकर के साथ इंदौर और किशोर कुमार के साथ खंडवा. निर्देशन और अभिनय के क्षेत्र में प्रतिवर्ष एक राष्ट्रीय पुरस्कार की भी पहल की गई है ताकि रीवा का बॉलीवुड से रिश्ता इसी बहाने बना रहे. 

ऑडिटोरियम उद्घाटन के इस कार्यक्रम में राजकपूर के बड़े बेटे रणधीर कपूर और प्रेमनाथ के बेटे प्रेम किशन शामिल हुए. लोगों को पहली बार पता चला कि प्रेम चौपड़ा की पत्नी उमा का जन्म भी रीवा में ही हुआ था, वो कृष्णा की छोटी बहन थी. प्रेम-उमा चौपड़ा यहां सबसे भावुक नजर आए.

वनवासियों की मुश्किल हमारे अंत की शुरुआत

कलारूपों में फिल्म सबसे सशक्त और प्रभावी माध्यम है. बॉलीवुड से रिश्तों की बदौलत इस क्षेत्र में संभावनाओं के द्वार खुलेंगे. वैसे इस क्षेत्र की प्रतिभाओं ने बॉलीवुड में अपने दम पर सम्मानजनक स्थान बनाया है. उनमें पहला नाम सतना के अशोक मिश्र का है. श्याम बेनेगल के साथ अशोक मिश्र ने "भारत एक खोज" की बहुप्रशंसित पटकथा लिखी. "वेलकम टु सज्जनपुर" और वेलडन अब्बा जैसी सार्थक फिल्मों का निर्देशन किया. दूसरा नाम चाकघाट के कुमुद मिश्र का है आज वे बालीवुड में अनुपम खेर और परेश रावल की अभिनयशैली के उत्तराधिकारी माने जाते हैं. जोगिंदर शेली पर राजकपूर की कृपा रीवा निवासी होने की वजह से ही रही. जोगिंदर ने 1974 में "बिंदिया और बंदूक" यहीं आकर बनाई. विंध्य की खूबसूरत वादियां देखनी हैं तो आर्काइव से निकाल कर इस फिल्म को जरूर देखें. इस फिल्म ने ही आशा सचदेव, लक्ष्मीछाया और रजामुराद को बॉलीवुड में स्थापित किया. जोगिंदर थे तो छोटे निर्माता लेकिन दूरदर्शी इतने कि जिस खलपात्र "रंगाखुश" को उन्होंने गढ़ा, बॉलीवुड उससे आज तक मुक्त नहीं हो पाया. गब्बर सिंह, मोगांबो, डॉ.डैंग जैसे साइको पात्र रंगाखुश के ही विस्तार माने जाते हैं. 

इस घटनाक्रम के बाद से उम्मीद जगी है कि बॉलीवुड एक बार फिर विंध्य की वादियों की ओर निगहबान होगा. इसलिए भी होगा कि दुनिया की यहां पहली व्हाइट टाइगर सफारी है ही और सबसे बड़ा सोलर प्लांट भी अस्तित्व में आ चुका है. बाणसागर की अथाह जलराशि किसी समुद्र सा अहसास देती है. यहां के खूबसूरत वन्यजीव अभयारण्य भी सैलानियों को मोहित करने के लिए पर्याप्त हैं.

Opinion : समाज को 'कालनेमियों' से बचाना है, तो हनुमत्व को जगाना होगा

बात बाणसागर की चल निकली है तो महाकवि बाण को भी स्मरण कर लें. बाणसागर इन्हीं के नाम को समर्पित है. छठवीं शताब्दी के महाकवि बाण को "हर्ष चरित" और "कादंबरी" जैसी कालजयी रचनाओं के लिए जाना जाता है. बाणभट्ट का जन्म इसी विंध्याटवी में शोण नद के किनारे हुआ. सोन के किनारे है भंवरसेन, बाण ने अपने जन्मस्थान का वर्णन यहीं का किया है. यह सीधी जिले में स्थित है. बाण के साहित्य पर शोध करने विश्व भर के अध्येता यहां आते हैं.

बाणभट्ट की कादंबरी को संस्कृत का पहला उपन्यास माना जाता है. छठवीं सदी की इस महान कृति पहली बार मंच पर उतार रही है. इसका श्रेय मध्यप्रदेश नाट्य विद्यालय भोपाल के निदेशक संजय उपाध्याय और उनके छात्रों को जाता है. तीन जन्मों की प्रेमकथा को नाटक में बदलना कोई आसान काम नहीं था, लेकिन इस चुनौती को स्वीकार किया है देश के प्रसिद्ध नाटककार योगेश त्रिपाठी ने. योगेश को "देशभर के रंगमंचों में "मुझे अमृता चाहिए" जैसी सफल कृति के लिए जाना जाता है.

योगेश त्रिपाठी की ही पहल पर हिंदी की पहली नाट्यकृति रीवा के महाराजा विश्वनाथ सिंह विरचित आनंद रघुनंदन का 86 वर्ष बाद पहला मंचन सफल हो पाया. कादंबरी की प्रस्तुति नाट्यविद्यालय के छात्रों ने अपने पाठ्यक्रम के तहत किया. इन दोनों अमरकृतियों के मंचन के साथ रीवा के कृष्णा-राजकपूर ऑडिटोरियम का रंगमंचीय शुभारंभ होगा. 

कृष्णा राजकपूर ऑडिटोरियम की जोड़ का कोई दूसरा रंगमंच कम से कम मध्यप्रदेश में फिलहाल नहीं है, इंदौर, भोपाल में भी नहीं. ऑडिटोरियम के रंगमंच की बारीकियां एनएसडी के प्रोफेसर रहे सुरेश भारद्धाज देख रहे हैं. ध्वनि और प्रकाश की व्यवस्था हो जाने के बाद यह ऑडिटोरियम रंगमंचीय दृष्टि से विश्वस्तरीय बन जाएगा.

इस घटाघोप को छांटिए वरना इतिहास माफ नहीं करेगा...!

विंध्यप्रदेश के विलोपन के बाद इस क्षेत्र ने तमाम तरह की उपेक्षाएं सही हैं. विकास की दौड़ में अन्य हिस्सों से पीछे तो हो ही गया था, कला और संस्कृति के क्षेत्र में भी इसका कोई घनीघोरी नहीं बचा था. देश में इतना समृद्ध अतीत शायद ही किसी क्षेत्र का रहा हो. जिस भूमि में संस्कृत का पहला महाकाव्य रचा गया हो (तमसा के तट पर वाल्मीकि का रामायण), जहां संस्कृत साहित्य की पहली गद्यकृति कादंबरी लिखी गई हो. जिस भूमि ने दुनिया को रामचरितमानस जैसे अलौकिक ग्रंथ के साथ रामलीला की परंपरा दी हो. जिसकी वादियों में तानसेन ने अपनी तान छेड़ी हो. जहां से बाबा अलाउद्दीन के सरोद का जादू दुनिया भर में बिखरा हो, उसका सांस्कृतिक वर्तमान निश्चित ही सुखद नहीं रहा अब तक.

विंध्य का सांस्कृतिक कायांतरण शुरू हो चुका है. सीधी जैसे अति पिछड़े जिले के ग्रामीण रंगकर्मी जब 111 दिन का रंग महोत्सव "महाउर" का अनुष्ठान करते हैं तो समूचे देश भर के कलापारखियों की निगाहें स्वमेव इधर खिंच जाती हैं. गोविंद नामदेव सरीखे अभिनय के दिग्गज उस सीधी को देश का रंगतीर्थ घोषित कर देते हैं जहां तक आजादी के इतने बरस बाद भी पहुँचने के रास्ते कंटकाकीर्ण और टेढ़े-मेढ़े हैं. विंध्य सांस्कृतिक संक्रांति से गुजर रहा है. यहां नए किस्म की रंगक्रांति ने जन्म लिया है. जिसकी तहजीब एनएसडी और एफटीटीआई से कहीं कमतर नहीं. इस कथित पिछड़े, विपन्न, उपेक्षित और साधनहीन क्षेत्र की हिमालयीन छलांग को अब देखते ही जाइये.. आगे क्या क्या होता है.