थिएटर ओलंपियाड : सांस्‍कृतिक हस्‍तक्षेप का विश्‍वमंच

मनुष्‍य की आवाज़ को मुखरित करने का एक बड़ा ज़रिया रंगमंच है और इसे सारी दुनिया स्‍वीकारती है.

थिएटर ओलंपियाड : सांस्‍कृतिक हस्‍तक्षेप का विश्‍वमंच

दुनिया के अमनचैन के लिए दुआएं करता विश्‍व रंगमंच दिवस (27 मार्च) इस बार हिन्‍दुस्‍तान में सौगात की तरह प्रकट हुआ है. संयोग ही है कि लगभग ढाई दशक पहले शुरू हुए थिएटर ओलंपियाड की मेजबानी इस बार भारत के हिस्‍से आई है और भारत सरकार ने इसे एक बड़े प्रतिष्‍ठा समारोह की तरह आयोजित करने के लिए उदार मन का परिचय दिया है. राष्‍ट्रीय नाट्य विद्यालय नई दिल्‍ली इसका संयोजन कर रहा है. 27 मार्च की तारीख ने इसके मकसद को नई रोशनी दी है. भारत के सत्रह शहरों में यह रंग महोत्‍सव क्रमश: जारी रहा है. मध्‍यप्रदेश की राजधानी भोपाल पिछले एक पखवाड़े से नाटकों से गुलज़ार है. 14 मार्च से शुरू हुआ यह जलसा भोपाल में 28 मार्च को पूरा होगा.

दरअसल संसार के मानचित्र पर यह नाटकों के बहाने एक बड़ी सांस्‍कृतिक गतिविधि की स्‍थापना है जहां मानवीय जीवन और उसके तमाम सरोकारों को विचार तथा मनोरंजन के बीच अभिव्‍यक्ति का एक व्‍यापक मंच मुहैया हुआ है. दिलचस्‍प यह भी कि मनुष्‍य की आवाज़ को मुखरित करने का एक बड़ा ज़रिया रंगमंच है और इसे सारी दुनिया स्‍वीकारती है.

भोपाल के भारत भवन और रवीन्‍द्र भवन के परिसरों में पंद्रह दिनों की गहमा-गहमी के बीच हिन्‍दी, मराठी, उडि़या, तमिल, बंगाली, कन्‍नड़, राजस्‍थानी, नेपाली और कश्‍मीरी से लेकर फ्रांस, स्‍पैनिश और अंगरेज़ी जैसी विदेशी भाषाओं के नाटकों को देखना बेशक दुर्लभ अनुभव रहा. विषयवस्‍तु, विचार और शिल्‍प-शैली की दृष्टि से और प्रयोग तथा नवाचार के लिहाज़ से यह ओलंपियाड नाटकों के बनते, बदलते और नई भंगिमाओं और प्रभावों को आत्‍मसात करती प्रवृत्तियों का खुलासा करता है. यह एक बड़े सांस्‍कृतिक विनिमय की ज़रूरत और संभावना भी है. समारोह का एक और महत्‍वपूर्ण पक्ष उसमें संवाद का शामिल होना रहा. डॉ. कमलेश दत्‍त त्रिपाठी, मोहन आगाशे, देवेन्‍द्र राज अंकुर, गोविन्‍द नामदेव आदि ने रंग संवाद में हिस्‍सा लिया.

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विवादों की छाया से भी यह समारोह अछूता नहीं रहा. नाटकों के चयन को लेकर, संयोजन की कड़ियों को लेकर और दर्शकों की रुचि-अरुचि को लेकर खानाबंदियों में सरगर्मी रही तो समारोह से जुड़ा विशेषज्ञों और कलाकारों का बड़ा खेमा ओलंपियाड को भारत की एक बड़ी घटना की तरह रेखांकित करता रहा है.

प्रसंगवश यह महत्‍वपूर्ण है कि भोपाल और पूरे मध्यप्रदेश के लोग अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के लिए जाने जाते हैं. यह राज्य कई लोकरंग विधाओं का बसेरा है. यहां पर समकालीन कलाओं को भी विस्तार मिलता रहा है. दुनिया का यह सबसे बड़ा थिएट्रिकल एक्स्ट्रावेगेंजा भोपाल के लोगों को 27 बेहतरीन प्रस्तुतियों से रूबरू होने का अवसर दे रहा है जिनमें लोक विधाओं के नाटक, विशेष रूप से आमंत्रित रंग निर्देशकों के नाटक और छह अंतरराष्ट्रीय प्रस्तुतियां शामिल हैं.

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नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के निदेशक प्रो. वामन केन्द्र कहते हैं कि पिछले तीन साल से हम थिएटर ओलम्पिक्स को भारत में लेकर आने का स्वप्न देख रहे थे. इस साल हमारा सपना पूरा हो गया. हमारे इस सपने को साकार करने में डॉ. महेश शर्मा और संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार का अभूतपूर्व सहयोग और रहा है. उनके अपार समर्थन की वजह से ही हमारा सपना सच बन सका है. हम हमेशा से शेक्सपियर और बर्तोल्त ब्रेख्‍़त के नाटकों को भारतीय रंग आदर्श का हिस्सा बनते देखते आ रहे हैं, मगर भारत में भी बेहतरीन नाटक का लेखन होने के बावजूद इस तरह का प्रभाव हम अब तक नहीं छोड़ सके हैं.

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भारतीय रंगमंच को दुनिया के नक्शे पर महत्वपूर्ण स्थान दिलाने में यह एक बड़ी कड़ी है. हमें भरतीय रंग परम्परा पर गर्व होना चाहिए, जो 2500 साल पुरानी है. जबकि मध्‍यप्रदेश में इस आयोजन के मुख्‍य प्रशासनिक सूत्रधार संस्कृति विभाग के प्रमुख सचिव, मनोज श्रीवास्तव के अनुसार, "दुनिया के सबसे बड़े थिएटर फेस्टिवल का सह–आयोजक होने पर राज्य को गर्व है. इस समारोह के माध्यम से हमें देश/दुनिया की प्रतिभाओं को भोपाल के रंगदर्शकों के सामने प्रस्तुत करने का एक अनोखा अवसर मिला है.''

थिएटर ओलंपिक्स क्‍या है?
थिएटर ओलंपिक्स की स्थापना 1993 में डेल्फी, ग्रीस में की गई. द थिएटर ओलंपिक्स के नाम से प्रसिद्ध इस अंतरराष्ट्रीय रंग महोत्सव के तहत दुनियाभर के बेहतरीन रंगकर्मियों को एक साथ लाया जाता है. यह रंगकर्म के छात्रों और रंगगुरुओं के लिए अनुभवों के आदान-प्रदान का एक मंच है, यहां वैचारिक, सांस्कृतिक और भाषागत विभेद के जरिए कलाकारों के मध्य एक आम संचार के विकास को प्रोत्साहन दिया जाता है. अब तक थिएटर ओलंपिक्स का आयोजन 7 बार ग्रीस (1995) जापान (1999), रशिया (2001), टर्की (2006), साउथ कोरिया (2010), चाइना (2014), पोलैंड (2016) में हो चुका है.

(लेखक वरिष्ठ कला संपादक और मीडियाकर्मी हैं)

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)