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ZEE जानकारी : आतंकी मसूद अजहर को बार-बार बचा रहा है चीन

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में मसूद अज़हर को Global Terrirost घोषित किए जाने के प्रस्ताव पर भी चीन ने ऐसा ही किया. 

ZEE जानकारी : आतंकी मसूद अजहर को बार-बार बचा रहा है चीन

एक तरफ दुनिया इस बात को लेकर Confused है, कि न्यूज़ीलैंड में हुए हमले को आतंकवादी हमला कहा जाए या नहीं. लेकिन, दूसरी तरफ मसूद अज़हर जैसे आतंकवादी का चरित्र पता होने के बावजूद, चीन जैसा देश उसे बचाने के लिए पूरा ज़ोर लगा रहा है. 

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में मसूद अज़हर को Global Terrirost घोषित किए जाने के प्रस्ताव पर भी चीन ने ऐसा ही किया. और फैसले की Deadline से ठीक एक घंटे पहले मसूद अज़हर के खिलाफ लाए गए प्रस्ताव पर चीन ने रोक लगा दी. लेकिन अगर चीन ये सोच रहा है, कि भारत उसके कदम से हताश और निराश हो चुका है. तो ऐसा बिल्कुल नहीं है. जिस तरह पुलवामा हमले के बाद भारत की आक्रामक कूटनीति ने पाकिस्तान को दुनियाभर में Expose कर दिया था. ठीक उसी तरह अब चीन को भी कूटनीतिक जवाब दिया जा रहा है. और इसके नतीजे आने शुरु हो गए हैं.

जैश ए मोहम्मद के खिलाफ फ्रांस ने अबतक की सबसे बड़ी कार्रवाई की है. 

आज फ्रांस के विदेश मंत्रालय, गृह मंत्रालय और वित्त मंत्रालय ने एक साझा बयान जारी किया है. 

जिसमें कहा गया है, कि फ्रांस के Monetary and Financial Code के तहत, फ्रांस में मौजूद मसूद अज़हर की सभी संपत्तियों को ज़ब्त किया जाएगा. 

इसके अलावा, European Union के आतंकवादियों की सूची में भी मसूद अज़हर का नाम डाला जा सकता है. 
फ्रांस ने फैसला किया है, कि वो European Union के अपने मित्र देशों के साथ इस विषय पर गंभीरता से बात करेगा.

साझा बयान में इस बात का भी ज़िक्र किया गया है, कि आतंकवाद के खिलाफ युद्ध में फ्रांस, हमेशा भारत के साथ खड़ा रहा है और भविष्य में भी खड़ा रहेगा. 

फ्रांस द्वारा कही गई बातें, सिर्फ कहने के लिए नहीं हैं. इसे समझने के लिए आपको पुलवामा हमले वाले दिन से लेकर आज तक के घटनाक्रम को जोड़कर देखना होगा.

14 फरवरी को पुलवामा हमले के बाद फ्रांस ने कहा था, कि वो भारत के साथ खड़ा है.

26 फरवरी को भारतीय वायुसेना के हवाई हमले के बाद फ्रांस ने भारत की आतंक विरोधी कार्रवाई का समर्थन किया था.

पुलवामा हमले के बाद फ्रांस के नेतृत्व में ही ब्रिटेन और अमेरिका ने मसूद अज़हर के ख़िलाफ संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में प्रस्ताव पेश किया था.

और जैसे ही चीन ने मसूद के खिलाफ लाए गए प्रस्ताव पर रोक लगाई, तो फ्रांस ने मसूद अज़हर की संपत्ति ज़ब्त करने का फैसला लिया. 

सिर्फ फ्रांस ही नहीं, सुरक्षा परिषद के कई सदस्य देश भी अब सीधे-सीधे चीन से टक्कर लेने के Mood में दिखाई दे रहे हैं.

मसूद अज़हर के खिलाफ चीन के रवैये से सुरक्षा परिषद के सदस्य नाराज़ हैं.

सदस्य देशों के प्रतिनिधियों ने ये तक कह दिया है, कि अगर चीन अपनी इसी नीति पर अड़ा रहा, तो दूसरे विकल्पों पर विचार किया जाएगा.

अमेरिकी थिंक टैंक के कई सदस्यों ने भी चीन के कदम की निंदा की है.

हालांकि, इन सभी लोगों ने अपना नाम सार्वजनिक ना करने की अपील की थी. इसलिए हम आपको इनके नाम नहीं बता रहे. इसके पीछे एक वजह है. 

सुरक्षा परिषद में होने वाला विचार-विमर्श गोपनीय होता है. इसलिए सदस्य देश सार्वजनिक रूप से इस पर टिप्पणी नहीं कर सकते. यही वजह है, कि इन सदस्य देशों के दूतों ने भी अपनी पहचान गोपनीय रखने का आग्रह किया था.

इस बीच ऐसी ख़बर भी आ रही है, कि अमेरिका सहित सुरक्षा परिषद के कई प्रभावशाली देश, एक Resolution ला सकते हैं.

इस Resolution में मसूद अज़हर को Global Terrorist घोषित करने के संबंध में सुरक्षा परिषद से Vote करने की अपील की जाएगी. ये मसूद अज़हर पर शिकंजा कसने का दूसरा तरीका है.

हालांकि, सुरक्षा परिषद में Voting की इस प्रक्रिया के बाद मसूद अज़हर के खिलाफ जो फैसला होगा, वो उतना प्रभावशाली नहीं होगा. जितना, सुरक्षा परिषद की 1267 Sanctions Committee के फैसले के बाद होता. ये सिर्फ एक सांकेतिक वोटिंग होगी.

अगर 1267 Sanctions Committee के फैसले के तहत, मसूद अज़हर सुरक्षा परिषद में Global Terrorist घोषित हो जाता, तो उस पर कई तरह के प्रतिबंध लग जाते.
मसूद अज़हर और उसके आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के सभी बैंक खाते सीज़ कर दिये जाते. 
उसकी सभी संपत्तियों पर सरकार का क़ब्ज़ा हो जाता.
संयुक्त राष्ट्र से जुड़े देशों के लोग उसकी किसी भी तरह की मदद नहीं कर पाते. 
कोई देश मसूद अज़हर या उसके संगठन को हथियार भी नहीं दे पाता.
इसके अलावा अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी घोषित होते ही मसूद अज़हर पर Travel Ban लग जाता. यानी उसकी Entry ऐसे किसी भी देश में नहीं हो पाती, जो संयुक्त राष्ट्र का सदस्य है. पूरी दुनिया में 206 में से 193 देश संयुक्त राष्ट्र के सदस्य है. यानी मसूद अज़हर की एंट्री 193 देशों में नहीं हो पाती.
लेकिन चीन ने मसूद अज़हर को बचा लिया.

अब अगर सुरक्षा परिषद में नये तरीके से Voting के ज़रिए मसूद अज़हर को अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी घोषित कर दिया जाता है, तो उससे पूरी दुनिया में एक कड़ा संदेश जाएगा और चीन पर दबाव बढ़ जाएगा.
हालांकि, सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य होने के नाते चीन, चीन इस बार भी Veto Power का इस्तेमाल करके, इसे रोक सकता है. यहां आपको बता दें कि Veto लैटिन भाषा का शब्द है. जिसका अर्थ होता है 'मैं अनुमति नहीं देता हूं'. 

हालांकि, ये भी दुर्भाग्य की बात है, कि भारत में ही कई लोग ऐसे हैं, जो मसूद अज़हर के मुद्दे पर चीन के फैसले का विरोध नहीं कर रहे. बल्कि भारत सरकार को ही पानी पी-पीकर कोस रहे हैं. और ये कह रहे हैं, कि मसूद अज़हर का Global Terrorist घोषित ना होना, भारत सरकार का Diplomatic Failure है. आज उनके ज्ञान में भी थोड़ी वृद्धि कर देते हैं.

सुरक्षा परिषद में मसूद अज़हर को Global Terrorist घोषित करने का प्रस्ताव चार बार लाया गया. और चारों ही बार चीन की वजह से ये प्रस्ताव पारित नहीं हो पाया. लेकिन, वर्ष 2009 से लेकर 2019 के बीच कुछ ऐसा भी हुआ, जिसपर किसी का ध्यान नहीं गया है.

वर्ष 2009 में तत्कालीन UPA सरकार ने सुरक्षा परिषद में मसूद अज़हर के खिलाफ प्रस्ताव दिया था. लेकिन उस वक्त भारत ये प्रस्ताव देने वाला, अकेला देश था. 

इसके बाद भारत ने यही प्रस्ताव 2016 में दिया. लेकिन इस बार भारत के प्रस्ताव को अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन का समर्थन मिला. 

वर्ष 2017 में, मसूद के खिलाफ प्रस्ताव लाने वाले देश थे, अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस

और इस बार भी यही तीन देश मसूद अज़हर के खिलाफ सुरक्षा परिषद में प्रस्ताव लेकर आए. लेकिन इस बार ध्यान देने वाली बात ये थी, कि सुरक्षा परिषद के 15 में से 14 देशो ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया. जबकि Security Council में ऑस्ट्रेलिया, बांग्लादेश, इटली और जापान जैसे अस्थायी देशों ने इस प्रस्ताव को अपने स्तर पर आगे बढ़ाया . 

इसका सीधा सा मतलब ये हुआ, कि 2009 की तुलना में 2019 में मसूद अज़हर के मुद्दे पर भारत की एक बहुत बड़ी कूटनीतिक जीत हुई है. क्योंकि इस बार अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के बड़े-बड़े देशों ने भारत का साथ दिया है. और मसूद के खिलाफ कार्रवाई में भारत के सभी मित्र देश मिलकर काम कर रहे हैं.

फ्रांस ने मसूद अज़हर को ग्लोबल टेररिस्ट मानते हुए उसकी संपत्तियां ज़ब्त करने का फैसला किया है.अमेरिका मसूद के ख़िलाफ़ UN में प्रस्ताव लाएगा. ब्रिटेन कोशिश कर रहा है, कि यूरोपियन यूनियन की आतंकी लिस्ट में मसूद की एंट्री हो जाए. ये तो दुनिया को रूख़ है. लेकिन हमारे ही देश का विपक्ष देश पर लगी चोट का मज़ाक बना रहा है. आज कांग्रेस पार्टी ने मसूद अजहर पर मोदी सरकार का मज़ाक उड़ाया 
है. 

चीन चाहता है कि पाकिस्तान में आतंकवाद की फैक्ट्रियां ऐसे ही चलती रहें.. और भारत पर हमले होते रहें. इसके पीछे चीन का क्या मक़सद हो सकता है...ये जानना भी बहुत ज़रूरी है...

China Pakistan Economic Corridor यानी CPEC पाकिस्तान के क़ब्ज़े वाले कश्मीर से गुज़रता है. और चीन कभी नहीं चाहता कि PoK फिर कभी भारत में शामिल हो.

क्योंकि अगर POK भारत में शामिल हुआ तो चीन की One Belt One Road योजना प्रभावित होगी . 

भारत ने चीन की One Belt One Road योजना का समर्थन नहीं किया इसलिए भी चीन, भारत का साथ नहीं दे रहा है . 

डोकलाम विवाद में भारत ने चीन का बहुत सख्त विरोध किया . इससे पूरी दुनिया में चीन की साख को बहुत धक्का लगा . 

पाकिस्तान में चीन ने 7 लाख करोड़ रुपये के निवेश का लक्ष्य रखा है . पाकिस्तान में 
रजिस्टर्ड विदेशी कंपनियों में सबसे ज्यादा 77 कंपनियां चीन की हैं . 

वर्ष 1950 के दशक में भारत ने तिब्बत के धर्मगुरु दलाई लामा को शरण दी थी . चीन, आज तक इस कूटनीतिक घाव को भूल नहीं पाया है . इसका बदला लेने के लिए भी चीन, सुरक्षा परिषद में भारत के खिलाफ वीटो करता है . 

चीन, अपने देश में उइगर मुसलमानों पर अत्याचार करता है . पाकिस्तान का मौन समर्थन हासिल करने के लिए भी चीन, मसूद अज़हर के साथ खड़ा है. 

चीन ये नहीं चाहता कि भारत, दक्षिण एशिया के मुद्दों में दखल दे . भारत को घरेलू मामलों में उलझा कर रखना चीन की कूटनीति है. 

चीन जानता है कि अगर भारत में आतंकवाद फैलता रहेगा, तो सीमाओं पर असुरक्षा बनी रहेंगी और इससे भारत कमज़ोर होगा.

चीन नहीं चाहता कि भारत.. अफ़ग़ानिस्तान में मज़बूत हो . इसलिये चीन, मसूद अज़हर जैसी उन तमाम शक्तियों का समर्थन करता है जो तालिबान से मिली हुई हैं .

चीन अमेरिका को अपना प्रतिद्वंदी मानता है और भारत और अमेरिका के बढ़ते सामरिक रिश्तों को लेकर वो काफी परेशान है.

बालाकोट में Air Strike के बाद भारत में विपक्ष का जोश काफी Down चल रहा था . लेकिन सुरक्षा परिषद में चीन के झटके के बाद विपक्ष का जोश एक बार फिर High हो गया है . 
कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी सहित विपक्ष के सभी नेताओं को बहुत आनंद आ रहा है. और इन सबने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तीखे हमले किये हैं. 

राहुल गांधी मे लिखा है कि कमज़ोर मोदी, चीन के राष्ट्रपति Xi Jinping से डरते हैं . जब चीन भारत के खिलाफ काम करता है तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मुंह से एक शब्द भी नहीं निकलता . 

भारत सरकार ने विपक्ष के ऐसे दावों को गलत ठहराते हुए कहा है कि आज सारी दुनिया आतंकवाद के मुद्दे पर भारत के साथ खड़ी है और चीन, दुनिया में आतंकवाद के मुद्दे पर Expose हो गया है.

राहुल गांधी ने चीन के मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना तो कर दी. लेकिन उन्हें इतिहास भी पढ़ लेना चाहिए . आज हमने कांग्रेस पार्टी के सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री शशि थरूर की किताब 'Nehru : The Invention of India' का अध्ययन किया है . 

इस किताब में लिखा है कि 
पंडित जवाहर लाल नेहरू ने विदेश नीति को राष्ट्रीय मूल्यों के उद्गम की तरह देखा . उन्होंने हिंदू धर्म के उपदेशों और बौद्ध धर्म के आदर्शों के आधार पर अपने राष्ट्रीय मूल्य बनाए . वो सम्राट अशोक के विशाल हृदय से काफी प्रभावित थे . और उनकी हर नीति में ये आदर्शवाद, यथार्थवाद पर हावी था . वर्ष 1953 में अमेरिका ने दक्षिण एशिया के लिए “Indian Monroe Doctrine” की परिकल्पना की थी . लेकिन जवाहर लाल नेहरू ने अमेरिका के इस प्रयास को खारिज कर दिया था . भारत के कई कूटनीतिज्ञों ने वो फाइलें देखी थीं और कहा था कि ठीक उसी दौर में जवाहर लाल नेहरू ने, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थाई सदस्यता के प्रस्ताव को ठुकरा दिया था . अमेरिका उस वक्त भारत को अपने पक्ष में करना चाहता था . लेकिन पंडित नेहरू नहीं माने . वो अपने आदर्शों को विश्व राजनीति में स्थापित करना चाहते थे . और इसीलिए उन्होंने सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता के प्रस्ताव को चीन की तरफ भेज दिया . 

आदर्शवाद और नैतिकता का बोझ पंडित नेहरू पर इतना ज्यादा था कि वो चीन को सुरक्षा परिषद की स्थाई सीट दिलवाने के लिए पूरी दुनिया में Lobbying करने लगे . 

आज हम कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी से ये निवेदन करना चाहते हैं कि उन्हें अपने सांसद शशि थरूर की किताब पढ़ने की ज़रूरत भी नहीं है . उन्हें सिर्फ शशि थरूर को एक Phone करना है और उनसे ये पूछना है कि पंडित जवाहर लाल नेहरू ने सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता के प्रस्ताव पर क्या फैसला लिया था ? राहुल गांधी इस वक़्त भारत के अगले प्रधानमंत्री बनने का सपना देख रहे हैं.. इससे उनकी कूटनीतिक समझ में ज़बरदस्त इज़ाफा भी होगा . 

आज सुरक्षा परिषद के स्थाई सदस्यों में 5 देश हैं . China, France, Russia, ब्रिटेन और अमेरिका

इस List में China के अलावा बाकी चार देश वो हैं जिन्होंने दूसरे विश्व युद्ध में जीत दर्ज की थी . मूल रूप से सुरक्षा परिषद में 11 सदस्य थे . इनमें 5 स्थाई सदस्य थे और 6 अस्थाई सदस्य थे . 

वर्ष 1965 में UN Charter में एक सुधार किया गया . और अस्थाई सदस्य देशों की संख्या को बढ़ाकर 15 कर दिया गया . पहले स्थाई देशो में France, Russia, ब्रिटेन और अमेरिका के बाद पांचवां देश ताइवान था . ताइवान को आधिकारिक रूप से Republic of China कहा जाता है . वर्ष 1971 में ताइवान की जगह पर People’s Republic of China को सुरक्षा परिषद में जगह दी गई . 

चीन को Third World के प्रतिनिधि के तौर पर सुरक्षा परिषद में जगह दी गई थी . आश्चर्य की बात ये है कि Third World या गुटनिरपेक्ष देशों के आंदोलन को खड़ा करने वाले भी पंडित जवाहर लाल नेहरू ही थे . उस दौर में अमेरिका और सोवियत संघ के बीच शीत युद्ध चल रहा था . नेहरू ने गुटनिर्पेक्षता की नीति अपनाई . इसका मतलब था कि अमेरिका और सोवियत संघ दोनों से दूरी बनाकर रखना . इन देशों को तीसरी दुनिया का देश कहा गया . पंडित जवाहर लाल नेहरू इन देशों के नेता थे . लेकिन तीसरी दुनिया के देशों के तौर पर मान्यता चीन को मिली. 

जबकि आज भी भारत सुरक्षा परिषद में स्थाई सीट का सबसे बड़ा दावेदार है . आज पूरी दुनिया में China, France, Russia, United Kingdom और अमेरिका ने जितने शांति सैनिक पूरी दुनिया में तैनात किए हैं . उससे भी दो गुना ज्यादा शांति सैनिक भारत ने तैनात किए हैं . 

आबादी, क्षेत्रफल, GDP, सभ्यता की प्राचीनता, सांस्कृतिक विविधता और राजनीतिक व्यवस्था के आधार पर भी भारत, सुरक्षा परिषद की सीट के लिए बहुत योग्य दावेदार है . लेकिन भारत अब भी विश्व समुदाय पर दबाव बना पाने में कामयाब नहीं हुआ है .