नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार बिहार सबसे पिछड़ा राज्य

नीती आयोग की रिपोर्ट के बाद जनता का आक्रोश सरकार के सामने आते दिख रहा है. बिहार सरकार ने रिपोर्ट के बाद अपने सर से जिम्मेदारी हटाते हुए कैंद्र सरकार पर निशाना साधा है.

नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार बिहार सबसे पिछड़ा राज्य

पटना: सामाजिक आर्थिक और पर्यावरण क्षेत्र में विकास को लेकर नीति आयोग ने 2019 की रिपोर्ट जारी कर दी है. रिपोर्ट आते ही बिहार के बुद्दिजीवी लोगों ने सरकार की आलोचना शुरू कर दी है क्योंकि रिपोर्ट के मुताबिक विकास के सूचकांक में बिहार पूरे देश में सबसे आखिरी पायदान पर जा पहुंचा है.

नीति आयोग ने जारी की 2019 की रिपोर्ट
नीति आयोग की रिपोर्ट ने बिहार के बुद्धिजीवी वर्ग में भी हलचल मचा दी है. वहीं बिहार में सत्ता संभाल रहे जेडीयू पार्टी की तरफ से बयान आया है कि विकास और पिछड़ेपन की खाई को पाटने के लिए बिहार को केन्द्र सरकार से एकमुस्त बड़े मदद की दरकार है. बिहार का विकास अपने लक्ष्य को हासिल करने से कोसों दूर है. इस बात का भी खुलासा नीती आयोग के द्वारा किया गया है. संयुक्त राष्ट्र संघ की मदद से नीति आयोग ने एसडीजी सूचकांक 2019 जारी किया है. संयुक्त राष्ट्र ने 100 संकेतों पर आधारित 54 लक्ष्यों के आधार पर राज्यों के विकास का रिपार्ट तैयार किया है. जिसमें भूखमरी, गरीबी, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, जीविकोपार्जन जैसे सामाजिक आर्थिक और पर्यावरण से जुड़े मुद्दे शामिल हैं. बिहार इन तमाम पैमाने पर खड़ा नहीं उतर पाया है.

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क्यों है बिहार सबसे पिछड़ा राज्य
बिहार के जाने माने इकोनॉमिस्ट प्रो नवल किशोर चौधरी की माने तो जिन मानको पर बिहार को पिछड़ा दिखाया गया है वो बिहार की हकीकत है. हाल के दिनों में कुछ काम जरुर हुए हैं लेकिन बिहार में जो बुनियादी बदलाव होने चाहिए वो नहीं दिख रहे हैं. बिहार में विकास की रफ्तार को गति देने में उद्योग धंधों की भी भूमिका अहम हो सकती थी. लेकिन बिहार इस मामले में अभी भी पीछे ही है. स्टेट इन्वेस्टमेंट प्रपोसल बोर्ड को अबतक महज 13669 हजार के ही इन्वेस्टमेंट के प्रोजल आए हैं जबकि 870 करोड के ही उद्योग वर्किंग कंडिशन में आ सके हैं. पीएचडी चैंबर ऑफ कामर्स पटना चैप्टर के अध्यक्ष सत्यजीत सिंह इसके पीछे की बड़ी वजह खुलासा करते हुए कहा है कि उद्योग धंधे अगर बिहार में लगते हैं तो बिहार में विकास की रफ्तार और तेज होगी. 2010 से पहले सीएम नीतीश कुमार ने उद्योग लगाने को लेकर काफी दिलचस्पी दिखायी थी लेकिन 2010 के बाद सरकार की दिलचस्पी उद्योग धंधों में कम हो गयी. पूंजीपति बिहार में उद्योग लगाने की इच्छा रखते थे लेकिन उद्योग के लिए जमीन नहीं मिलने की वजह से उद्योग नहीं लग सके. यहां तक की लगातार औध्योगित नीति में बदलाव भी उद्योग के विकास में रुकावट की बड़ी वजह बन गयी है. इसके साथ ही यह भी कहा कि बिहार में उद्योग लगाए जाते हैं तो स्थानीय लोगों के लिए रोजगार का सृजन भी हो सकेगा.