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शेयर बाजार में ऐसे मौकों पर लगता है सर्किट, जानें क्यों लगाना पड़ता है यह

शेयर बाजार के इतिहास में अबतक सात बार सर्किट लगा है. पिछले 10 साल में स्टॉक मार्केट में सर्किट नहीं लगा है. साल 2004 के बाद शेयर बाजार में दो बार अपर सर्किट लगे हैं. यह हुआ था 18 मई 2009 को, उस समय कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए सरकार को दोबारा शानदार जीत मिली थी.

शेयर बाजार में ऐसे मौकों पर लगता है सर्किट, जानें क्यों लगाना पड़ता है यह

नई दिल्ली : शेयर बाजार के इतिहास में अबतक सात बार सर्किट लगा है. पिछले 10 साल में स्टॉक मार्केट में सर्किट नहीं लगा है. साल 2004 के बाद शेयर बाजार में दो बार अपर सर्किट लगे हैं. यह हुआ था 18 मई 2009 को, उस समय कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए सरकार को दोबारा शानदार जीत मिली थी. इस दिन शेयर बाजार में दो अपर सर्किट लगे थे, इसके चंद मिनट बाद ही बाजार में 10 प्रतिशत की तेजी देखने को मिली थी. इसके बाद 1 घंटे के लिए कारोबार रोके जाने के बाद फिर जब मार्केट खुला था तो फिर से एक बार सर्किट लगता दिख रहा था.

जनवरी 2008 में लगा था लोअर सर्किट
दूसरी तरफ शेयर बाजार में अब तक पांच बार लोअर सर्किट लगे हैं. सहयोगी चैनल जी बिजनेस रिसर्च एनालिस्ट संदीप ग्रोवर बताते हैं कि सबसे पहले 21 जनवरी 2008 को लोअर सर्किट लगा था. इस समय 10 प्रतिशत का सर्किट लगा था. इस दिन सेंसेक्स में 2000 अंक की जोरदार गिरावट देखने को मिली थी. इस दिन दुनियाभर के शेयर बाजारों का जबरदस्त असर भारतीय शेयर बाजार में देखने को मिला था. आपको बता दें यह यहीं नहीं थमा, बल्कि अगले दिन यानी 22 जनवरी 2008 को एक बार फिर 10 प्रतिशत का लोअर सर्किट लगा था और उस समय भी शेयर बाजार में 2000 अंकों की गिरावट देखने को मिली थी.

एक और 10 प्रतिशत की सर्किट अक्टूबर 2017 में लगा था, हालांकि यह पी नोट्स का मामला था. दरअसल, पी नोट्स को लेकर कुछ सख्ती हुई थी जिसको लेकर ऐसी स्थिति हुई थी. इससे पहले साल 2006 में सीबीडीटी का एक सर्कुलर आया था जिसमें एफपीआई के टैक्स के जो नियम हैं उसमें बढ़ोतरी की बात हो रही थी जिसको लेकर बाजार में चिंता थी. इस दिन बाजार में 10 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई थी.

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शेयर बाजार में सर्किट अस्थिरता के माहौल में घबराहट से होने वाली बिकवाली को रोकने के लिए लगाया जाता है. व्यक्तिगत प्रतिभूतियों में कीमतों के बड़े बदलाव पर भी रोक लगाने में ये सहायक होते हैं. शेयर बाजार में सर्किट ब्रेकर प्रतिशत में पहले से निर्धारित होते हैं जो किसी भी शेयर या इंडेक्स में किसी भी दिशा में भारी बदलाव होने पर स्वचालित तरीके से ट्रिगर का काम करते हैं. कितनी कीमत बढ़ने या गिरने पर सर्किट ब्रेकर लगेगा इसका निर्धारण पिछले क्लोजिंग रेट से तय होता है. सर्किट ब्रेकर शेयरों और सूचकांक दोनों के लिए निर्धारित होते हैं. सर्किट ब्रेकर का उल्लंघन करने पर कई कदम उठाए जा सकते हैं.