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ZEE जानकारी: एक त्रासदी को TRP के उत्सव में बदल देने वाली पत्रकारिता का विश्लेषण

बिहार के मुजफ्फरपुर में दिमागी बुखार से अब तक 119 बच्चों की मौत हो चुकी है . ये बहुत संवेदनशील मामला है. लेकिन हमारे देश के कुछ पत्रकारों ने इस मामले पर बहुत अ-संवेदनशील पत्रकारिता की है .

ZEE जानकारी: एक त्रासदी को TRP के उत्सव में बदल देने वाली पत्रकारिता का विश्लेषण

और अब हम देश के कुछ नामी पत्रकारों के Death Tourism का DNA टेस्ट करेंगे. बिहार के मुजफ्फरपुर में दिमागी बुखार से अब तक 119 बच्चों की मौत हो चुकी है . ये बहुत संवेदनशील मामला है. लेकिन हमारे देश के कुछ पत्रकारों ने इस मामले पर बहुत अ-संवेदनशील पत्रकारिता की है .

सोशल मीडिया पर आजकल कुछ ऐसे वीडियो वायरल हैं, जिसमें कुछ पत्रकार अस्पताल के ICU के अंदर डॉक्टरों से लड़ते हुए और उनको ज़ोर-ज़ोर से डांटते हुए नज़र आ रहे हैं. ये आक्रामक रिपोर्टिंग सिर्फ और सिर्फ TRP के लिए की जा रही है. बच्चों की मौत पर कुछ न्यूज़ चैनलों में TRP का गिद्ध भोज चल रहा है. ऐसा लग रहा है... जैसे बच्चे नहीं भारत की पत्रकारिता ही ICU में चली गई है. इसलिए इस नकारात्मक पत्रकारिता का विश्लेषण आज ज़रूरी हो गया है.

हम उन पत्रकारों की बात कर रहे हैं जिनको लगता है कि उनके माइक और कैमरे से ही भारत की व्यवस्था चल रही है. ये पत्रकार Air-Conditioned कमरों में रहते हैं . दिल्ली से सीधे Flight पकड़कर पटना पहुंचते हैं और फिर वहां से Air-Conditioned गाड़ियों में सवार होकर सीधे मुजफ्फरपुर पहुंच जाते हैं. अस्पताल के अंदर भी ये पत्रकार किसी की बात नहीं सुनते हैं . इन पत्रकारों को देश में एक अघोषित VIP Status मिला हुआ है . ये लोग सीधे ICU के अंदर घुस जाते हैं . और ICU के लिए ज़रूरी किसी भी नियम-कानून का पालन नहीं करते हैं . 

ये पत्रकार जूते पहनकर, कैमरा लेकर, कैमरा पर्सन के साथ सीधे ICU के अंदर जाते हैं और अपने माइक से डॉक्टरों, नर्सों और मरीज़ों के परिवार वालों पर सवालों के हमले कर देते हैं . ज़रा सोचिए... क्या ये पत्रकार मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के दफ्तर में भी इन्हीं तेवरों के साथ प्रवेश कर सकते हैं .

ICU का Full Form होता है... Intensive Care Unit... यहां मरीज की देखभाल बहुत सावधानी से की जाती है . ICU के अंदर प्रवेश करने के कुछ नियम होते हैं . 

जैसे... ICU में मरीजों के परिवार वाले 10 मिनट से ज्यादा नहीं रुक सकते हैं . 

ICU के अंदर अस्पताल के ही Shoe Cover पहनने होते हैं .

ICU के अंदर अस्पताल का एक Gown पहनना होता है .

अंदर जाने से पहले हाथों को Sanitizer से साफ करना होता है . 

ये नियम कानून इसलिए बनाए गए हैं ताकि इन्फेक्शन फैलाने वाला कोई बैक्टीरिया अस्पताल के ICU के अंदर नहीं पहुंच सके . 

लेकिन देश के ये बुद्धिमान पत्रकार, इन्फेक्शन को अपने साथ लेकर पूरे अस्पताल को Torture करते हैं . 

आप ज़रा अहंकार से भरे हुए इन पत्रकारों के सवालों पर गौर कीजिए .

मरीज़ों के परिवार वालों से ये सवाल पूछा जाता है कि क्या हुआ है ? क्या नाम है ? 

जिन सवालों के जवाब सारी दुनिया जानती है . वही सवाल बार-बार दोहराए जाते हैं . 

ये ठीक वैसे ही है... जैसे अगर किसी की मृत्यु हो जाए तो उसके परिवार वालों से ये सवाल पूछा जाए कि आपको कैसा लग रहा है ? 

आपने देखा होगा... जब भी हमारे देश में कोई संक्रामक बीमारी फैलती है. अक्सर, अस्पतालों में बेड कम पड़ जाते हैं . सारी व्यवस्था बिगड़ जाती है . लेकिन ऐसी स्थिति में भी Doctor और Nurse से बार-बार ये सवाल पूछा जाता है कि एक Bed पर दो बच्चों को क्यों रखा गया है ? क्या सरकारी अस्पतालों में इस स्थिति के लिए Doctor या Nurse ज़िम्मेदार है ? लेकिन बुद्धिमान पत्रकारों को इन मूल सवालों से कोई लेना देना नहीं हैं . उनका लक्ष्य सिर्फ और सिर्फ अपना TV कैमरों के सामने अपना चेहरा चमकाना होता है . 

छोटे शहरों के ऐसे अस्पतालों में डॉक्टर बहुत कम सैलरी पर चौबीस घंटे काम कर रहे हैं . लेकिन ये पत्रकार, Doctors का हौसला बढ़ाने की बजाय उनको अपमानित करने वाले सवाल पूछते हैं . इनके सवालों में Dialogues की मात्रा कुछ ज़्यादा ही होती है. ये लोग जनता की सेवा नहीं बल्कि जन सेवा का अभिनय करते हैं . 

सवाल है कि अगर ये पत्रकार इतने चिंतित हैं, तो बिना कैमरे के भी तो अस्पताल जाकर वहां बच्चों का हाल पता कर सकते हैं. वो कैमरे के साथ ही क्यों अस्पताल के अंदर जाना चाहते हैं. ये पत्रकार इतनी तेज़-तर्रार पत्रकारिता से बच्चों का भला करना चाहते हैं या फिर अपना? आक्रामक रिपोर्टिंग भारतीय मीडिया की एक बहुत संक्रामक बीमारी है. जो बहुत तेज़ी से दूसरे न्यूज़ चैनलों के दफ्तरों में भी फैल जाती है. मुजफ्फरपुर में भी कुछ ऐसा ही हुआ है. एक न्यूज़ चैनल की ICU वाली रिपोर्टिंग के बाद.. दूसरे न्यूज़ चैनल्स के संपादक भी अपने रिपोर्टरों को ICU वाली रिपोर्टिंग के लिए निर्देश देते हैं . 

और आश्चर्य की बात ये है कि हर रिपोर्टर यही कहता है कि वो घटनास्थल पर पहुंचने वाला पहला रिपोर्टर है. 

कुछ Dialogues तो ऐसे हैं जो अब देश के हर नागरिक को याद हो चुके हैं...

जैसे...... ये इस वक्त की Breaking News है 

हमारी खबर का असर हुआ है 

हम ये खुलासा कर रहे हैं.... 

ये पत्रकार इस तरह का अभिनय करते हैं... जैसे बीमार बच्चों के लिए काम कर रहे हैं . 

लेकिन असलियत में ये सारे दावे नकली हैं . ये ऐसे पत्रकारों का TRP वाला Formula है . जो जनता के सामने बार-बार Expose हो चुका है . 

हमारे देश की नकारात्मक पत्रकारिता इस वक्त अपने शिखर पर है . सच्चाई ये है कि बच्चों की सेहत से किसी का कोई लेना देना नहीं है . अगर इन पत्रकारों को वाकई में बच्चों की फिक्र होती तो ये जूते पहनकर ICU के अंदर नहीं गए होते . 

इस आक्रामक पत्रकारिता का असर देश की राजनीति पर भी होता है . अचानक अस्पतालों में मंत्रियों, सांसदों, विधायकों और नेताओं के दौरे शुरू हो जाते हैं . ये सभी दौरे सहानुभूति दिखाने के लिए होते हैं . लेकिन ये सब भी सिर्फ और सिर्फ Death Tourism का ही एक और रूप है . 

इस तरह की नकारात्मक पत्रकारिता के खिलाफ आजकल लोगों में बहुत ज्यादा गुस्सा है . पत्रकारों के इस आचरण से डॉक्टर भी बहुत दुखी हैं . Doctors के Whats-App Groups पर ऐसे पत्रकारों के खिलाफ एक चिट्ठी भी Viral हो रही है, जिसमें गुस्से की मात्रा बहुत ज्यादा है . 

मुजफ्फरपुर में दिमागी बुखार के इलाज के लिए सिर्फ एक सरकारी अस्पताल है. जिसका नाम है- 

इन पत्रकारों की आक्रामक रिपोर्टिंग के बाद इस अस्पताल में एक नोटिस लगा दिया गया है . इस नोटिस पर लिखा है...
ICU Ward के अंदर Doctor, Nursing Staff और मरीज के परिवार वालों के अलावा किसी को अंदर जाने की अनुमति नहीं है . 
इस अस्पताल में कुल 620 Bed हैं . 

दिमागी बुखार से पीड़ित बच्चों के लिए यहां पर 50 Beds अलग कर दिए गए हैं . 
यहां ICU में 100 से ज्यादा बच्चों को भर्ती किया गया है.
इसलिए एक Bed पर दो-दो बच्चों का इलाज चल रहा है. 
इस अस्पताल में बच्चों के लिए कम से कम 50 Beds और होने चाहिए . 

((यहां एक शिफ्ट में 14 डॉक्टर लगाए गए हैं . इनमें 3 सीनियर डॉक्टर, 6 जूनियर डॉक्टर और 5 Trainee हैं. ))

और अब हम मीडिया को हुए एक ख़तरनाक इन्फ़ेक्शन का विश्लेषण करेंगे, जिसकी वजह से पत्रकारिता आज ICU में पहुंच गई है. बिहार में Acute En-cepha-litis की वजह से बच्चों की मौत की ख़बर की चर्चा पूरे देश में हो रही है. देश के कई बड़े-बड़े चैनल इस ख़बर को अपनी ज़िम्मेदारी बताते हुए दिखा रहे हैं. लेकिन, बच्चों की मौत की ख़बर दिखाने के चक्कर में वो उनकी जान को ही और ख़तरे में डाल रहे हैं. 

बच्चों की बीमारी और उनकी मौत की ख़बरें दिखाने के चक्कर में इन डिज़ाइनर पत्रकारों को ये ख़याल भी नहीं रहा कि उनकी ऐसी रिपोर्टिंग बच्चों और डॉक्टरों की परेशानी को और बढ़ा रही है. ये डिज़ाइनर पत्रकार बिना ज़रूरी एहतियात के ही ICU में घुस कर जो रिपोर्टिंग कर रहे हैं, वो मरीज़ों के लिए जानलेवा भी हो सकती है.

क्योंकि कैमरे में बैक्टीरिया हो सकते हैं. माइक से इन्फ़ेक्शन हो सकता है. लेकिन इसकी परवाह किए बिना ये कैमरामैन और रिपोर्टर ICU में घुस गए. इतने लंबे सफ़र के बाद अस्पताल पहुंचे कैमरामैन और रिपोर्टर इन्फ़ेक्शन से भरे होते हैं. उन्होंने सिर नहीं ढका. जूते नहीं उतारे और सीधे ICU में घुस गए. वो ऐसा इसलिए कर रहे हैं क्योंकि वो अपना करियर चमकाना चाहते हैं. कुछ डिज़ाइनर पत्रकारों ने ऐसा किया, तो फिर दिल्ली में बैठे हुए संपादकों ने कहा कि फलां चैनल का रिपोर्टर ICU में घुस गया, तुम क्यों नहीं घुसे ?

इसके बाद बच्चों की मौत की ख़बर की रिपोर्टिंग करने पहुंचा हर रिपोर्टर, एंकर और कैमरामैन अपना करियर चमकाने के लिए ICU में घुसने लगा. फिर उसे न मरीज़ों की परवाह रही, न डॉक्टरों के काम में पड़ने वाली बाधा की चिंता. वो TRP की रेस में इतनी तेज़ भागने लगे कि पत्रकारिता को ही ICU वाला इन्फ़ेक्शन हो गया.

मीडिया का ये ऐसा इनफ़ेक्शन मरीज़ों के लिए तो घातक है ही, ये हमारे समाज को भी बीमार कर सकता है.इसलिए आप को ऐसे इन्फ़ेक्शन से सावधान करना हमारी ज़िम्मेदारी है.

मीडिया को अपनी ज़िम्मेदारी समझनी चाहिये. उसे बच्चों की मौत जैसे संवेदनशील मामलों से अपनी सनसनी फैलाने वाली विचारधारा को दूर रखना चाहिये.

आपको आरुषि-हेमराज मर्डर केस याद होगा. इस केस में Re-construction के नाम पर बहुत ही भद्दी रिपोर्टिंग की गई थी. 

अभिनेत्री श्रीदेवी के निधन के बाद की गई रिपोर्टिंग. 24 फरवरी 2018 को श्रीदेवी की दुबई के एक होटल में मौत हो गई थी. ये एक हादसा था. इसके बाद भारत में कई न्यूज़ चैनलों ने इस घटना पर शर्मनाक रिपोर्टिंग की. 

ऐसे मीडिया संस्थानों को ये समझना चाहिये कि इस तरह की रिपोर्टिंग पूरी पत्रकारिता को बदनाम करती है. इसलिये मीडिया संस्थानों को अपनी ज़िम्मेदारी समझते हुए इस तरह की प्रदूषित रिपोर्टिंग से बचने की ज़रूरत है.