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ZEE जानकारी: देश में एक बार फिर एक्टिव हुआ 'असहिष्णु गैंग'

हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री सहित अलग-अलग क्षेत्रों की 49 हस्तियों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक चिट्ठी लिखी है.

ZEE जानकारी: देश में एक बार फिर एक्टिव हुआ 'असहिष्णु गैंग'

भारत, दुनिया का सबसे सहनशील देश है. 'वसुधैव कुटुंबकम्' यानी पूरी दुनिया ही एक परिवार है. ये भारतीय संस्कृति का अमूल्य विचार है. दुनिया की कोई और संस्कृति या सभ्यता अपना दिल इतना बड़ा नहीं कर पाई, कि उसने पूरी दुनिया को परिवार की तरह स्वीकार कर लिया हो. लेकिन हमारे देश के बुद्धिजीवियों का एक वर्ग इस सच्चाई को आज तक स्वीकार नहीं कर पाया है. बुद्धिजीवियों के इसी गैंग को हम प्यार से 'असहिष्णु गैंग' कहते हैं. और इनकी नादान अहसिष्णुता देखकर हमें इनपर तरस आता है. 

ख़बर ये है, कि देश में एक बार फिर से असहिष्णु गैंग एक्टिव हो गया है. कल हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री सहित अलग-अलग क्षेत्रों की 49 हस्तियों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक चिट्ठी लिखी है.

इस चिट्ठी में अनुराग कश्यप, केतन मेहता, श्याम बेनेगल, रामचंद्र गुहा, शुभा मुद्गल, अपर्णा सेन और कोंकणा सेन शर्मा जैसी हस्तियों के हस्ताक्षर हैं. चिट्ठी लिखने का मकसद है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ध्यान देश में बढ़ती असहिष्णुता की तरफ आकर्षित करना. चिट्ठी में लिखा गया है, कि इन दिनों देश में धर्म, जात-पात और Mob Lynching से जुड़े मामले बढ़ते जा रहे हैं. नरेंद्र मोदी का ज़िक्र करते हुए चिट्ठी में ये भी लिखा गया है, कि संसद में प्रधानमंत्री ने Mob Lynching जैसे मामलों का ज़िक्र ज़रुर किया. लेकिन ऐसे गंभीर विषयों को सिर्फ संसद में उठाना काफ़ी नहीं है.

ऐसे मामलों पर कड़े क़ानून बनने चाहिए. ताकि इन बढ़ते मामलों की संख्या बढ़ने की बजाए कम हो. और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की जा सके. आज हमने भी इस चिट्ठी को बहुत ध्यान से पढ़ा. और हम इन सभी 49 लोगों की चिंता समझ सकते हैं. 
लेकिन फिर हमारा ध्यान इस चिट्ठी में लिखे गए कुछ शब्दों पर गया. 

और ये शब्द थे, मुस्लिम, दलित और अल्पसंख्यक

चिट्ठी में 'जय श्री राम' का भी ज़िक्र किया गया है. और बड़े अफसोस के साथ लिखा गया है, कि इस वक्त हमारे देश में जय श्री राम एक तरह से भड़काने वाला War Cry बन चुका है. जिसकी वजह से क़ानून व्यवस्था बिगड़ रही है. और जय श्री राम के नाम पर Mob Lynching हो रही है.

चिट्ठी में ये भी लिखा गया है, सरकार के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले लोगों को अपने ही देश में Anti National और Urban Naxal कहकर पुकारा जाता है.

भारत का लोकतंत्र देश के हर नागरिक को अभिव्यक्ति की आज़ादी का अधिकार देता है. लेकिन जब इसी Freedom Of Expression का इस्तेमाल Selective एजेंडे के तहत किया जाने लगे, तो इससे समाज को हानि पहुंचती है. इस मामले में बिल्कुल ऐसा ही हुआ है. क्योंकि, पूर्वाग्रह से पीड़ित इन 49 लोगों ने धर्म विशेष और जाति विशेष के नाम पर देश को बांटने की कोशिश की है. और ऐसा एक बार नहीं, बार-बार हुआ है. 

21 मार्च को गुरुग्राम के भोंडसी में दो पक्षों में क्रिकेट की गेंद लगने से झगड़ा हो गया था. इसके बाद, एक पक्ष के लोगों ने दूसरे पक्ष के घर में घुसकर लाठी-डंडे और पत्थर से मार-पीट की. पीड़ित ने कहा, हिंदू-मुस्लिम का झगड़ा नहीं है. पुलिस ने भी कहा कि लड़ाई खेल की है. लेकिन, पहले इस झगड़े का Video सोशल मीडिया पर Viral हुआ. फिर कुछ नेताओं के बयान आए. मोहल्ले की लड़ाई को हिंदू-मुस्लिम रंग देने की पूरी कोशिश की गई.

वहां पर विवाद तो क्रिकेट खेलने को लेकर हुआ था. लेकिन एक ख़ास तरह की राजनीति करने वालों ने उसे दो धर्मों का झगड़ा बना दिया. और, इसके बाद धार्मिक सहिष्णुता पर बड़ी बहस छिड़ गई. लेकिन, असहिष्णुता गैंग की इस रेसिपी में भी एक twist है. अगर पीड़ित मुस्लिम है, तो अलग है और हिंदू है, तो अलग.
हमने इसी महीने दिल्ली में हुई घटना में ये भी देखा.

दिल्ली के मोतीनगर में 11 मई को ध्रुव राज त्यागी की हत्या कर दी गई. ध्रुव राज को इसलिए मार डाला गया, क्योंकि वो अपनी बेटी से छेड़छाड़ का विरोध कर रहे थे. आरोपी मुस्लिम थे. लेकिन, इस घटना से धार्मिक सहिष्णुता ख़तरे में नहीं पड़ी. न ही वो गैंग सक्रिय हुआ, जो ये कहकर बार-बार डराता आया है कि आपका लोकतंत्र ख़तरे में है....

2016 में उत्तर प्रदेश का कैराना शहर हिन्दुओं के पलायन की वजह से सुर्खियों में आया था. लेकिन उस वक्त यही बुद्धिजीवी आंखों पर पट्टी बांध कर बैठे रहे. किसी ने उन हिन्दू परिवारों की पीड़ा पर कोई चिट्ठी नहीं लिखी.

बिल्कुल यही तस्वीर इसी वर्ष मेरठ के प्रह्लाद नगर और उसके आस-पास के इलाकों में दिखाई दी. एक धर्म विशेष से जुड़े लोगों की गुंडागर्दी, अपराध, सरेआम फायरिंग की घटनाएं और महिलाओं से छेड़-छाड़ के बाद बड़ी संख्या में हिन्दू परिवारों ने अपना घर छोड़ दिया. लेकिन किसी ने इनके लिए भी कोई चिट्ठी नहीं लिखी.

और यही बात हमें 49 हस्तियों द्वारा लिखी गई चिट्ठी की असली मंशा पर सवाल खड़े करने को मजबूर करती है. क्योंकि, एक खास एजेंडे के तहत ये मुहिम चलाई जा रही है, कि भारत में धार्मिक स्वतंत्रता पर खतरा बढ़ता जा रहा है. अल्पसंख्यों के खिलाफ नफरत का माहौल पैदा किया जा रहा है. जबकि, ऐसा कुछ भी नहीं है. Intolerance यानी असहनशलीता एक ऐसा शब्द है जो आज हमारे देश के बुद्धिजीवियों का तकिया क़लाम बन चुका है . हमारे देश के बुद्धिजीवी इतने बड़े क्रांतिकारी हैं कि वो हर घटना को सीधे लोकतंत्र पर खतरे, संविधान पर संकट और असहनशीलता से जोड़ देते हैं. ऐसे सभी लोगों को आज Expose करना ज़रुरी है.

चिट्ठी लिखने वाले लोगों में कुछ लोग ऐसे भी हैं, जिन्होंने 2014 में प्रधानमंत्री मोदी को वोट ना देने के लिए भी चिट्ठी लिखी थी. और इस बार लिखी गई चिट्ठी में कुछ ऐसे लोग भी हैं, जिनके संबंध ऐसे NGO's से थे, जिनपर हाल-फिलहाल में सरकार ने कार्रवाई की है. और उनके फंड रोक दिए हैं. वैसे चिट्ठी के ज़रिए असहिष्णुता का माहौल बनाने वाले गैंग का ये पैंतरा पहली बार सामने नहीं आया है. 

आपको याद होगा, इसी वर्ष अप्रैल के महीने में एक चिट्ठी को Social Media पर Viral किया गया था. इस चिट्ठी में मोदी सरकार पर सेना का राजनीतिकरण करने और उसका चुनावी इस्तेमाल करने का आरोप लगाया गया था. कथित तौर पर इसमें सेना के 150 से ज़्यादा पूर्व अफ़सरों के नाम भी थे. और ये दावा किया गया था, कि इन अफसरों ने इस चिट्ठी में लिखी बातों का समर्थन किया है.

कांग्रेस पार्टी ने भी इस चिठ्ठी को सोशल मीडिया पर वायरल करने की कोशिश की. लेकिन चिट्ठी Viral होने के कुछ ही घंटों में सेना के कई अफ़सरों ने इस चिट्ठी की जानकारी होने से इनकार कर दिया था. यानी ये चिट्ठी Fake News की Factory का एक नया उत्पाद थी. जो लॉन्च होते ही Expose हो गई. देश को गुमराह करने वाली ये चिठ्ठी देश के राष्ट्रपति को लिखी गयी थी, लेकिन उस वक्त राष्ट्रपति भवन की तरफ से कहा गया था कि उसे ऐसी कोई चिट्ठी नहीं मिली है.

इसी घटना से कुछ दिन पहले रंगमंच के करीब 700 कलाकारों ने भी एक पत्र लिखकर बीजेपी और उसके सहयोगियों को वोट ना देने की अपील की थी. 

अक्टूबर 2015 की घटना याद कीजिए. उस वक्त हमारे देश में अवॉर्ड वापस करने का एक फैशन चल रहा था. जिसके वायरस ने भारत के कई तथाकथित बुद्धिजीवियों को अपनी चपेट में ले लिया था. पहले कुछ लेखकों और साहित्यकारों ने अपने साहित्य अकादमी अवॉर्ड लौटाए. और ये कहा कि देश में बढ़ती असहनशीलता के विरोध में साहित्य अकादमी कुछ बोल नहीं रही है. फिर बाद में अवॉर्ड वापस करने के फैशन ने ज़ोर पकड़ लिया.

और देश के 12 फिल्मकारों ने अपने नेशनल अवॉर्ड वापस कर दिए. जिनमें दिबाकर बनर्जी और आनंद पटवर्धन जैसे फिल्मकार शामिल थे. उस वक्त इन लोगों की दलील थी, कि देश में डर का माहौल है. 2015 का वक्त इमरजेंसी से भी भयानक है. कुछ लोगों ने 4 साल पहले ये कहकर अपना अवॉर्ड लौटाया था, क्योंकि, वो भारत के भविष्य को लेकर बहुत चिंतित थे. और ये भी कहा था, भारत में लोकतंत्र का भविष्य खतरे में है. 

चार साल के बाद जब नरेंद्र मोदी की सरकार प्रचंड बहुमत के साथ एक बार फिर सत्ता में आई है. तो देश में मौजूद असहिष्णु गैंग और अवॉर्ड वापसी गैंग ने एक बार फिर वही Narrative, Set करने की कोशिश की है. 2014 हो या 2019 हो...दोनों ही मौकों पर जब से मोदी सरकार आई है, तब से देश के कई बुद्धिजीवी, विचारक, लेखक, और कलाकार, खुला पत्र लिखकर राजनीतिक एजेंडा चलाने लगे हैं. ये लोग अवॉर्ड वापस करते हैं, सार्वजनिक मंच पर ये कहते हैं कि देश में असहनशीलता बढ़ गई है. भारत में रहना मुश्किल हो गया है. देश में उनका और उनके परिवार का दम घुट रहा है. ऐसी तमाम बातें एक ख़ास तरह के पूर्वाग्रह के तहत कही जाती हैं. और इन बातों का वास्तविकता से कोई लेना देना नहीं है.

धार्मिक स्वतंत्रता पर रिपोर्ट बनाने वाली संस्थाएं हों, या असहिष्णुता का माहौल बनाकर अपना एजेंडा चलाने वाले लोग हों . इन सभी ने ना सिर्फ भारत के विषय में गलत धारणा बनाई है. बल्कि इसी गलत धारणा का प्रचार करके भारत की अखंडता को चोट भी पहुंचाई है. इसकी वजह है उनका अज्ञान. आम तौर पर ऐसी अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं या लोग, ये मानकर चलते हैं, कि जो बहुसंख्यक है वो अत्याचारी ही होगा. दुनिया के बहुत सारे देशों के बारे में उनकी ये धारणा सही हो सकती है. लेकिन भारत के बारे में उनका ये आंकलन पूरी तरह गलत है. क्योंकि भारत एक हिंदू बहुल आबादी वाला देश है. और हिंदू धर्म दुनिया का सबसे सहनशील धर्म है . 

हो सकता है, कि खुद को धार्मिक स्वतंत्रता, उदारवाद और मानवता का चैंपियन बताने वाले ऐसे लोग महात्मा गांधी को अपना आदर्श पुरुष मानते होंगे. लेकिन सच्चाई ये है कि महात्मा गांधी द्वारा कही गई और लिखी गई बातों को भी इन बुद्धिजीवियों ने ठीक से पढ़ा भी नहीं होगा. 

20 अक्टूबर 1927 को महात्मा गांधी ने अंग्रेजी की साप्ताहिक पत्रिका 'Young India' में एक लेख लिखा था. जिसका शीर्षक था
'मैं हिंदू क्यों हूं ?' इस लेख में हिंदू धर्म के बारे में महात्मा गांधी ने लिखा था कि 

मैं वंशानुगत गुणों के प्रभाव में विश्वास रखता हूं और मेरा जन्म एक हिंदू परिवार में हुआ है इसलिए मैं हिंदू हूं. अगर मुझे ये अपने नैतिक बोध या आध्यात्मिक विकास के विरुद्ध लगे तो मैं इसे छोड़ दूंगा. अध्ययन करने पर जिन धर्मों को मैं जानता हूं, उनमें मैंने इसे सबसे अधिक सहिष्णु पाया है. हिंदू धर्म में सैद्धांतिक कट्टरता नहीं है. ये बात मुझको बहुत आकर्षित करती है. क्योंकि इस कारण इसके अनुयायी को आत्म अभिव्यक्ति का अधिक से अधिक अवसर मिलता है. हिंदू धर्म वर्जनशील नहीं है. अत: इसके अनुयायी ना सिर्फ दूसरे धर्मों का आदर कर सकते हैं. बल्कि वो सभी धर्मों की अच्छी बातों को पसंद कर सकते हैं और अपना सकते हैं. अहिंसा सभी धर्मों में है. लेकिन हिंदू धर्म में इसकी उच्चतम अभिव्यक्ति और प्रयोग हुआ है . 

आप भी चाहें तो National Book Trust द्वारा प्रकाशित इस किताब को पढ़ सकते हैं इसका शीर्षक है... हिंदू धर्म क्या है ? इसमें हिंदू धर्म पर महात्मा गांधी के लेखों और उनके भाषणों का संकलन किया गया है . 

हमारे देश के बुद्धिजीवियों को जय श्री राम के नारे से काफी Allergy है . वो ये कहते हैं कि जय श्री राम का नारा अब एक War Cry यानी युद्ध घोष बन चुका है . बुद्धिजीवी अपने हर भाषण में बार-बार ये ज़रूर कहते हैं कि भारत महात्मा गांधी का देश है . लेकिन वो ये भूल जाते हैं कि महात्मा गांधी ने ही राम राज्य की कल्पना को साकार करने की कोशिश की थी . महात्मा गांधी भारत में जिस व्यवस्था को स्थापित करना चाहते थे . उसके मूल में राम राज्य है . 

जय श्री राम... का मतलब किसी की पराजय नहीं है . जय श्री राम का मतलब है... सदाचार, मानवता, सहनशीलता और संवेदनशीलता की विजय . जय श्री राम का नारा...किसी का दमन नहीं करता है . जय श्री राम का नारा, किसी व्यक्ति के अंदर मौजूद सद्भाव को और बढ़ाता है . लेकिन ये बात बुद्धिजीवियों को कभी समझ में नहीं आएगा . क्योंकि बुद्धिजीवियों को लगता है कि इस दुनिया में वो ही सबसे बुद्धिमान हैं . 

भगवान श्री राम के नाम पर कोई भी आरोप लगाने से पहले बुद्धिजीवियों को ये सोच लेना चाहिए कि राम, भारत की संस्कृति का दूसरा नाम है . भारत के रोम रोम में राम हैं.

भारत में जन्म से लेकर मृत्यु तक... हर संस्कार भगवान राम के नाम से ही शुरू और भगवान राम के ही नाम से खत्म होते हैं . भारत में जब किसी बच्चे का जन्म होता है तो भगवान राम के बचपन का वर्णन करने वाले गीत गाए जाते हैं . भारत में जब किसी की मृत्यु होती है तो अंतिम यात्रा में कहा जाता है... 'राम नाम सत्य है' . भगवान राम भारतीय संस्कृति की आत्मा हैं . उनके नाम से जुड़े किसी नारे का अपमान, भारतीय संस्कृति का अपमान है . 

भगवान राम 135 करोड़ भारतीयों के आदर्श पुरुष हैं . राम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाता है . लोग भगवान राम में आदर्श पुत्र, आदर्श भाई, आदर्श मित्र, आदर्श पति और आदर्श राजा की छवि देखते हैं . भगवान राम, इंसानों को ही नहीं पशुओं को भी अपने साथ लेकर चलते हैं . वानर सेना के साथ लंका की विजय करने वाले महामानव श्रीराम के गुणों के वर्णन में कई ग्रंथ, कई साहित्य लिखे गए . भगवान राम, शबरी के झूठे बेर खाते हैं . भगवान राम, निषाद राज को अपने गले से लगाते हैं . सबको साथ लेकर चलने की जो क्षमता भगवान राम ने दिखाई . वो इतिहास के किसी और नायक में नज़र नहीं आती है . 

भगवान राम का नाम, भारत की आत्मा में बस चुका है . तथाकथित बुद्धिजीवियों की लाख कोशिशें भी भारत और भारत के लोगों को भगवान राम से दूर नहीं कर सकती हैं. 

ये बात सही है कि हर देश में अपनी कमियां होती हैं. जिसका आत्मविश्लेषण किया जाना चाहिए. लेकिन भारत दुनिया का सबसे ज़्यादा विविधता वाला देश भी है. यहां अलग अलग लोगों के अपने अलग अलग मुद्दे और मतभेद भी हैं. ये हमारे लोकतंत्र की खूबसूरती है कि तमाम मतभेदों के बावजूद हम सब एक हैं. भारत की सादगी और सहनशीलता की सबसे बड़ी मिसाल...भारत रत्न डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम थे.

आज अगर डॉक्टर कलाम होते...तो वो इस असहिष्णु गैंग की सोच पर बहुत दुखी होते. ये घटनाएं दुनिया भर में देश का नाम ख़राब करती हैं. इन सभी घटनाओं को अपराध की नज़र से देखना चाहिए. और ऐसे अपराधियों को सज़ा देने का हक भी क़ानून के पास ही है. लेकिन हमारे देश का एक वर्ग इन घटनाओं को धर्म विशेष से जोड़कर देश को बांटने की कोशिश कर रहा है. देश को अपने मन से दंगों वाली सोच का बॉयकॉट करने के लिए आज डॉक्टर कलाम की सीख याद करनी चाहिए...डॉक्टर कलाम ने कहा था कि..

कोई भी धर्म अपने प्रसार के लिए दूसरों की हत्या की इजाज़त नहीं देता 
और धर्म हमेशा मित्र बनाने के काम आना चाहिए. हालांकि छोटी सोच वाले लोग इसे लड़ाई के हथियार के तौर पर इस्तेमाल
करते हैं.

डॉक्टर कलाम के इन विचारों को अगर भारत का हर नागरिक अपने मन में जगह दे दे..तो भारत में धर्म और जाति के नाम पर होने वाली हिंसा..हमेशा-हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी.. और यही डॉक्टर कलाम को सच्ची श्रद्धांजलि होगी.

Tolerance यानी सहनशीलता शब्द का अर्थ होता है किसी चीज़ को बर्दाश्त करने की क्षमता . जबकि Intolerance यानी असहनशीलता इसका विपरित शब्द है जिसका अर्थ है किसी माहौल, स्थिति, विचार या व्यवहार को बर्दाश्त ना करना . लेकिन हमारे देश में इन दोनों शब्दों को एक खास Gang ने Highjack कर लिया है . ये Gang अपनी सहूलियत के हिसाब से इन शब्दों का इस्तेमाल करता है . और देश के लोकतंत्र को बदनाम करने की कोशिश करता है . इस गैंग में फिल्मी दुनिया के कई लोग, डिजाइनर पत्रकार और बुद्धिजीवी शामिल हैं . लेकिन आज हम इन लोगों को Tolerance यानी सहनशीलता का सही अर्थ बताएंगे .

क्या ये लोग जानते हैं कि इस साल 14 फरवरी को पुलवामा में जब CRPF के जवानों पर आतंकी हमला हुआ था, तब हमारे जवानों ने कैसे सहनशीलता का अदम्य परिचय दिया था . आपकी और हमारी खातिर दुश्मनों की गोलियों का सामना करना, असली सहनशीलता है. कोई जवान जब राजस्थान में 50 डिग्री तापमान के बीच सरहदों की सुरक्षा करता है तो उसे असली सहनशीलता कहते हैं . माइनस 50 डिग्री तापमान में सियाचिन पर जब कोई जवान देश की हिफाज़त करता है तो उसे सही मायनों में सहनशीलता कहते हैं . 

जवानों की सहनशीलता की एक ऐसी ही तस्वीर पुलवामा से भी आई है. पुलवामा आज की तारीख में जम्मू-कश्मीर का सबसे संवेदनशील इलाका बना हुआ है. यहां भारतीय सेना के जवान मुश्किल हालात के बीच देश के लिए अपना फर्ज़ निभा रहे हैं .

ज़ी न्यूज़ की टीम ने पुलवामा जाकर ये समझने की कोशिश की है कि इतनी संवेदनशील परिस्थितियों में देश के जवान कैसे अपने हौसलो को कायम रखते हैं . सुरक्षा बलों के साथ-साथ उनके वाहनों को भी निशाना बनाया जाता है .

सुरक्षा बलों की इन गाड़ियों पर पत्थरों के निशान इस बात की गवाही देते हैं कि जम्मू कश्मीर में सुरक्षा बलों के सामने कितनी बड़ी चुनौती है . पत्थरों से बुरी तरह जख्मी ये वाहन चीख चीख कर सुरक्षा बलों की मुश्किलों को बयान कर रहे हैं. फिर भी जम्मू-कश्मीर पुलिस, CRPF और सेना के जवान हिम्मत नहीं हारते . और चुनौतियों के बावजूद पूरे पराक्रम के साथ अपना कर्तव्य निभाते हैं. ये असली और सच्ची सहनशीलता है . DNA के कश्मीर विशेषांक भाग 2 में आज हम आपको पुलवामा लेकर चलेंगे . और सुरक्षा बलों को पत्थरबाज़ों से बचाने वाले एक वाहन की तस्वीरों के ज़रिए, आपको सुरक्षा बलों के Rock Solid हौसलों के बारे में बताएंगे .

सबसे पहले आप पुलवामा से हमारी ये स्पेशल रिपोर्ट देखिए...फिर हम अपने इस विश्लेषण को आगे बढ़ाएंगे 

पुलवामा जम्मू-कश्मीर का एक हिस्सा है. ये राज्य का छठा सबसे बड़ा शहर है. लेकिन 14 फरवरी को हुए हमले के बाद पुलवामा की पहचान बदल गई . पुलवामा का नाम सुनकर आज सिर्फ बम धमाके, एनकाउंटर्स और आतंकी हमलों की याद आती है. लेकिन हकीकत में पुलवामा ऐसा नहीं है .

वहां Cricket के Bats भी बनाए जाते हैं और बड़े पैमाने पर दूध का उत्पादन भी होता है. यानी पुलवामा भारत के किसी भी दूसरे शहर की तरह है. जिसकी अपनी विशेषताएं है . लेकिन 14 फरवरी के बाद से बदले हालात ने पुलवामा को मुश्किल दौर में पहुंचा दिया है . पुलवामा से ज़ी न्यूज़ के एडिटर सुधीर चौधरी बता रहे हैं कि कैसे पुलवामा को सिर्फ एक नज़रिए से पेश किया जा रहा है . जबकि पुलवामा की कहानी में आतंकवाद के अलावा भी कई पन्ने हैं . 

लेकिन असहिष्णुता पर फिल्मी कहानी लिखने वाले गैंग को शायद ये हालात भी काल्पनिक यानी fictional ही लगते होंगे . इसलिए आज हम इन लोगों के लिए पुलवामा की धरती से देशभक्ति की डोज़ वाला विशेषांक लेकर आए हैं . पुलवामा में हुए आतंकी हमले में देश के 40 जवान शहीद हो गए थे . ये हमला जैश ए मोहम्मद के आतंकवादियों ने किया था . जैश-ए- मोहम्मद पाकिस्तान से संचालित होने वाला आतंकवादी संगठन है . लेकिन तब हमारे देश के कई नेताओं बुद्धिजीवियों और डिज़ाइनर पत्रकारों ने यहां तक कह दिया था कि ये हमला पाकिस्तान से आए आतंकवादियों ने नहीं किया है, बल्कि इसकी साजिश देश के ही कुछ भटके हुए नौजवानों ने रची थी .