ZEE जानकारी: 7 साल बाद भी निर्भया को है इंसाफ का इंतजार

 आज से ठीक 7 वर्ष पहले दिल्ली और पूरे देश में आक्रोश था. क्योंकि दिल्ली की एक बेटी के साथ एक चलती बस में 6 लोगों ने हैवानियत की सारी हदें पार कर दी थीं. 

ZEE जानकारी: 7 साल बाद भी निर्भया को है इंसाफ का इंतजार

अच्छा होता अगर आज के दिन देश की महिलाओं के लिए 'निर्भय' होकर चलने की आज़ादी मांगी जाती. महिलाओं के लिए सुरक्षित सड़क और सुरक्षित समाज की आज़ादी मांगी जाती, लेकिन सच को स्वीकार करने में कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए.और आज की सच्चाई यही है कि महिलाओं की सुरक्षा के मामले में हमारा समाज और सिस्टम. दोनों फेल हो चुके हैं. आज से ठीक 7 वर्ष पहले दिल्ली और पूरे देश में आक्रोश था. क्योंकि दिल्ली की एक बेटी के साथ एक चलती बस में 6 लोगों ने हैवानियत की सारी हदें पार कर दी थीं.

इस वारदात को पूरा देश निर्भया केस के नाम से जानता है. और हर साल 16 दिसंबर को हम ये सवाल पूछते हैं कि हमारे देश में रेप जैसे घृणित अपराध आखिर कम क्यों नहीं होते हैं ? पिछले 7 साल में हमारे देश में 2 बार कानून में सख्त बदलाव किए गए . 2012 में निर्भया केस के बाद ये कानून बना कि... ऐसे जघन्य अपराध में 16 वर्ष से अधिक उम्र के दोषियों के खिलाफ वयस्कों की ही तरह मुकदमा चलेगा .  इसी तरह 2018 में कठुआ केस के बाद ये कानून बना कि 12 वर्ष से कम उम्र की बच्ची के साथ रेप पर मौत की सज़ा या कम से कम 20 साल की जेल की सज़ा होगी.

लेकिन हमारे देश में बलात्कार के मामले बढ़ते ही जा रहे हैं . National Crime Records Bureau यानी NCRB के ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक 2011 में करीब 24 हज़ार महिलाओं के साथ रेप की वारदात हुई . जबकि वर्ष 2017 में महिलाओं के साथ बलात्कार के 32 हज़ार 559 मामले सामने आए . वर्ष 2011 में इस देश में प्रति दिन औसतन 66 महिलाओं के साथ रेप हो रहा था. जबकि 2017 में ये आंकड़ा बढ़कर 89 हो गया. यानी अब ये साफ है कि सिर्फ कानून को सख्त बना देने से महिलाओं के प्रति अपराध में कमी नहीं आएगी .

क्योंकि लोगों में इस कानून का डर नहीं है ....और इस कानून का डर इसलिए नहीं है क्योंकि पिछले 14 साल में रेप के सिर्फ एक दोषी को फांसी हुई है. ये फांसी वर्ष 2004 में हुई थी .वर्ष 2016 में रेप और हत्या से जुड़े 24 मामलों में फांसी की सज़ा तो हुई, लेकिन फांसी किसी को नहीं हुई . इसी तरह 2017 में भी रेप और हत्या से जुड़े 43 मामलों में फांसी की सज़ा हुई, लेकिन फांसी किसी को नहीं हुई . और 2018 में भी रेप और हत्या से जुड़े 58 मामलों में फांसी की सज़ा दी गई, लेकिन अभी तक फांसी किसी को नहीं हो सकी है

विश्लेषण को आगे बढ़ाने से पहले आपको एक जानकारी देना चाहेंगे, जो आज के दिन राहत लेकर आई है . उन्नाव रेप कांड में बीजेपी से निकाले गए विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को आज अदालत ने दोषी ठहरा दिया है . लेकिन, इस खबर का दूसरा पहलू ज्यादा महत्वपूर्ण है ...और वो ये है कि...दिल्ली की इस निचली अदालत ने CBI को फटकार लगाई है . कोर्ट ने नाराज़गी जताई कि CBI ने चार्जशीट दाखिल करने में 1 साल का समय क्यों लगा दिया .

आपको याद होगा कि हाल ही में जब हैदराबाद में बलात्कार के आरोपियों का एनकाउंटर हुआ, तब अधिकांश लोगों ने इसपर खुशी जताई . ऐसा नहीं है कि हमारा समाज एनकाउंटर का समर्थक हो गया है . बल्कि सच्चाई ये है कि पुलिस और न्यायिक व्यवस्था की धीमी गति को देखकर लोगों की उम्मीद दम तोड़ चुकी है .

यही वजह है कि आज निर्भया को याद करते हुए, दिल्ली में फिर से लोग सड़कों पर उतरे . तिहाड़ जेल के बाहर इकट्ठा होकर लोगों ने मांग की...कि निर्भया के गुनहगारों को जल्द फांसी दी जाए .

लेकिन असली बदलाव तब आएगा, जब हमारे समाज में महिलाएं निर्भय होकर घर से बाहर निकल सकेंगी . ज़ी न्यूज़ ने 16 दिसंबर के मौके पर यही जानने की कोशिश की...कि हमारी सड़कें, हमारी पुलिस, हमारा समाज आज 7 साल बाद कितना बदला है ?
तो बदलाव कैसे लाया जाए ? इस सवाल का जवाब उस इंसान से बेहतर भला कौन दे सकता है, जो 16 दिसंबर 2012 को निर्भया के ही साथ था . हम निर्भया केस में सबसे बड़ी गवाही की बात कर रहे हैं . वो गवाही, जिसने 16 दिसंबर को दिल्ली में हुए गैंगरेप का पूरा सच पहली बार दुनिया के सामने रखा था .

3 जनवरी 2013 को रात करीब 2 बजे अवनींद्र पांडे का ये इंटरव्यू मैंने ही किया था...इस इंटरव्यू को अबतक करोड़ों लोग देख चुके हैं...और ख़बरों की दुनिया में ये सबसे ज़्यादा देखे जाने वाले Interviews में से एक है...इस इंटरव्यू का एक अंश आज हम आपको दिखाना चाहते हैं..ताकि आपको अंदाजा हो जाए कि हमारे सिस्टम की सोच में क्या दिक्कत है.