लोकसभा चुनाव 2019: क्या यूपी में बीएसपी का गेम बिगाड़ने में जुटी है कांग्रेस?

यूपी में बीएसपी अध्यक्ष मायावती ने कांग्रेस के प्रति सख्त रवैये के कारण उसे सपा-बसपा ने गठबंधन में जगह नहीं दी. ऐसे में कांग्रेस यूपी में बीएसपी का गेम बिगाड़ने की रणनीति पर काम कर रही है.

लोकसभा चुनाव 2019: क्या यूपी में बीएसपी का गेम बिगाड़ने में जुटी है कांग्रेस?
यूपी में बीएसपी 38, सपा- 37 और आरएलडी 3 सीटों पर लोकसभा चुनाव लड़ रही है.

नई दिल्ली: लोकसभा चुनाव 2019 में यूपी में बीएसपी अध्यक्ष मायावती ने कांग्रेस के प्रति सख्त रवैये के कारण उसे सपा-बसपा ने गठबंधन में जगह नहीं दी. आलम यह है कि ग्रांड ओल्ड पार्टी कांग्रेस को अपना दल (कृष्णा गुट) और महान दल जैसे छोटे दलों के साथ मिलकर चुनाव लड़ना पड़ रहा है. यूपी में सपा बसपा और आरएलडी के महागठबंधन ने कांग्रेस को अछूत बना दिया है. ऐसे में कांग्रेस यूपी में बीएसपी का गेम बिगाड़ने की रणनीति पर काम कर रही है.

यूपी में बीएसपी 38, सपा- 37 और आरएलडी 3 सीटों पर लोकसभा चुनाव लड़ रही है. बीएसपी के कोटे में पश्चिमी यूपी और पूर्वी यूपी की अधिकांश सीटें आई हैं. कांग्रेस अब बीएसपी की सीटों पर ऐसे प्रत्याशी उतार रही है जिससे बीएसपी का खेल बिगड़ सकता है. सबसे पहले बात सहारनपुर लोकसभा सीट की करते हैं. सहारनपुर में बीएसपी ने हाजी फजर्लुरहमान को टिकट दिया है तो कांग्रेस ने इस सीट पर बड़े मुस्लिम नेता इमरान मसूद को अपना प्रत्याशी बनाया है. वहीं बीजेपी ने एक बार फिर मौजूदा सांसद राघव लखनपाल को ही चुनावी मैदान में उतारा है. सहारनपुर में कांग्रेस की रणनीति ये है कि यहां किसी भी सूरत में बीएसपी न जीतने पाए. बीएसपी और कांग्रेस में अगर मुस्लिम वोटों का बंटवारा होता है तो ये सीट बीजेपी के लिए आसान बन जाएगी.

अब बात करते हैं बिजनौर लोकसभा सीट की. बिजनौर में बीएसपी ने मलूक नागर को टिकट दिया तो कांग्रेस ने कद्दावर मुस्लिम नेता नसीमुद्दीन को प्रत्याशी बनाया है. बीजेपी ने मौजूदा सांसद कुंवर भारतेंदू को एक बार फिर से बिजनौर से टिकट दिया है. इस सीट पर भी नसीमुद्दीन सिद्दीकी मुस्लिम वोट काटेंगे, जिसका सीधा नुकसान बीएसपी को तो फायदा बीजेपी को होता हुआ दिखाई दे रहा है.

अमरोहा लोकसभा सीट पर बीएसपी ने जेडीएस से आए दानिश अली को जैसे ही प्रत्याशी घोषित किया, उसके तुंरत बाद ही कांग्रेस ने राशिद अल्वी को अपना प्रत्याशी घोषित कर दिया. हालांकि अगले ही दिन राशिद अल्वी ने कांग्रेस का टिकट वापिस कर दिया. यहां भी कांग्रेस की रणनीति बीएसपी को निपटाने की ही थी, हालांकि बाद में कांग्रेस ने सचिन चौधरी को टिकट दिया और बीजेपी से मौजूदा सांसद कंवर सिंह तंवर चुनाव लड़ रहे हैं.

अलीगढ़ लोकसभा सीट पर बीएसपी ने जैसे ही जाट नेता अजीत बालियान को टिकट दिया, कांग्रेस ने तुंरत चौधरी बिजेन्द्र सिंह को प्रत्याशी घोषित कर दिया जो कि अलीगढ़ के बड़े जाट नेता माने जाते हैं. अलीगढ़ में भी जाट वोटों का बंटवारा होता हुआ दिखाई पड़ रहा है, जो कि बीएसपी की रणनीति पर पानी फेर सकता है. बीजेपी ने यहां भी मौजूदा सांसद सतीश गौतम को टिकट दिया है. अब बात करते हैं आगरा से सटी फतेहपुर सीकरी लोकसभा सीट की. यहां पर बीएसपी ने राजवीर सिंह को टिकट दिया हैं. यूपी कांग्रेस के अध्यक्ष राज बब्बर मुरादाबाद लोकसभा सीट छोड़कर फतेहपुर सीकरी से चुनावी मैदान में कूद चुके हैं. राज बब्बर इस सीट पर बीएसपी का ही वोट काटते हुए नज़र आएंगे.

 

पूर्वांचल में भी कांग्रेस अपना रही यही रणनीति
अब आपको बीएसपी और कांग्रेस की लड़ाई की अंदर की ख़बर बताते हैं. दरअसल दलित वोट बैंक बीएसपी का मूल मतदाता माना जाता है और उसके साथ जब मुस्लिम और अन्य बिरादरियां जुड़ जाती हैं तो बीएसपी को फायदा हो जाता है. लेकिन एससी वोट बैंक एक ज़माने में कांग्रेस का मतदाता माना जाता था और बीएसपी इस मतदाता को कांग्रेस से छीन कर अपने पाले में लाई है. बीएसपी से जुड़े सूत्रों की माने तो मायावती को हमेशा इस बात का डर रहता है कि कहीं एससी वोट बैंक कांग्रेस की ओर दोबारा ना चला जाए. वहीं कांग्रेस से जुड़े सूत्रों का मानना है कि अगर यूपी में बीएसपी कमज़ोर होती है तो एससी और मुस्लिम मतदाता एक बार कांग्रेस से जुड़ सकते हैं. यही प्रमुख वजह है कि बीएसपी किसी भी सूरत में कांग्रेस से गठबंधन करने को तैयार नहीं होती है. मायावती इसीलिए समय समय पर कांग्रेस के ख़िलाफ़ बयान देती रहती हैं. 

समाजवादी पार्टी को भी कांग्रेस से यही डर रहता है कि कहीं उनका मुस्लिम मतदाता कांग्रेस की तरफ शिफ्ट न हो जाए. हालांकि अखिलेश यादव बीएसपी अध्यक्ष मायावती को खुश रखने के लिए भी कांग्रेस का पुरजोर विरोध करते हैं. अब देखना यह होगा कि आखिर यूपी की ये लड़ाई किसका खेल बनाती है और किसका बिगाड़ती है.