राजमहल लोकसभा सीट: मतदाताओं के मन को समझना मुश्किल, सभी पार्टियों के बीच कड़ा मुकाबला

एक ओर जहां सत्ता पर काबिज बीजेपी 2014 की शानदार जीत को दोहराना चाहती है तो वहीं, दूसरी ओर विपक्ष भी बीजेपी को केंद्र से हटाने में किसी तरह की कसर नहीं छोड़ना चाहती है.

राजमहल लोकसभा सीट: मतदाताओं के मन को समझना मुश्किल, सभी पार्टियों के बीच कड़ा मुकाबला
यह कभी कांग्रेस का परंपरागत सीट हुआ करती थी. (फाइल फोटो)

राजमहल: 2000 में बिहार से अलग होने के बाद झारखंड नया राज्य बना और कई राजनीतिक समीकरण भी बदले. फिलहाल देशभर में 2019 में होने वाले लोकसभा चुनावों को लेकर केंद्र और विपक्ष दोनों ही अपनी तैयारियों में जुट गए हैं. एक ओर जहां सत्ता पर काबिज बीजेपी 2014 की शानदार जीत को दोहराना चाहती है तो वहीं, दूसरी ओर विपक्ष भी बीजेपी को केंद्र से हटाने में किसी तरह की कसर नहीं छोड़ना चाहती है. जिसके चलते केंद्र से लेकर राज्यों तक की राजनीति गरमाई हुई है. 

अगर बात झारखंड के राजमहल सीट की करें तो यह अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित सीट रही है. यह कभी कांग्रेस का परंपरागत सीट हुआ करती थी लेकिन 1998 में यहां बीजेपी आई तो 1999 में कांग्रेस. इसके बाद यहां से कभी कांग्रेस, कभी बीजेपी तो कभी जेएमएम ने जीत दर्ज की.

2009 लोकसभा चुनाव में यहां से देवीधन बसरा ने बीजेपी से दर्ज की तो 2014 में यहां से जेएमएम के विजय कुमार हंसदक ने जीत दर्ज की. जेएमएम हर हाल में चतरा में 2014 की जीत को दोहराना चाहेग तो बाकी पार्टियां भी इसमें कोई कसर नहीं छोड़ेगी. 

लहाल पार्टियों की प्राथमिकता जनता के मन को टटोलने की होगी. देखने वाली बात ये है कि कौन सी पार्टी यहां से किसे उम्मीदवार के रूप में खड़ा करती है और साथ ही दुमका लोकसभा क्षेत्र में इस लोकसभा चुनाव में कैसा मूड रहता है. 2019 लोकसभा से पहले चतरा में भी लोगों के बीच यही चर्चा का विषय है कौन सी पार्टी किसे वोट देगी.