उगते सूर्य को अर्घ्‍य देकर संपन्न हुआ चैत्र छठ का व्रत, पांडवों से जुड़ी है इस पूजा की कहानी

हिंदू कैलेंडर के अनुसार हिंदू नववर्ष के पहले महीना चैत्र है और चैत्र माह के छठें दिन छठ पर्व का त्योहर सूर्यदेव के प्रसन्न करने के लिए मनाया जाता है.

उगते सूर्य को अर्घ्‍य देकर संपन्न हुआ चैत्र छठ का व्रत, पांडवों से जुड़ी है इस पूजा की कहानी
फाइल फोटो

नवरात्रों की तरह हर साल दो बार सूर्य की उपासना का व्रत छठ भी मनाया जाता है. 9 अप्रैल को नहाय-खाय के साथ इस महापर्व की शुरुआत हो गई थी. दूसरे दिन 10 अप्रैल को लोगों द्वारा खरना व्रत किया गया है. इसके बाद सूर्य भगवान को सायंकालीन अर्घ्य 11 अप्रैल यानी आज दिया गया और 12 अप्रैल के दिन उदीयमान सूर्य को अर्घ्य देने के साथ यह अनुष्ठान संपन्न हो गया.

हिंदू कैलेंडर का पहला महीना है चैत्र
हिंदू कैलेंडर के अनुसार हिंदू नववर्ष के पहले महीना चैत्र है और चैत्र माह के छठें दिन छठ पर्व का त्योहर सूर्यदेव के प्रसन्न करने के लिए मनाया जाता है. पुराणों के अनुसार, चैत्र मास में सूर्यदेव की पूजा विवस्वान के नाम से करनी चाहिए. इन दिनों पुराणों के अनुसार वैवस्वत मनवंतर चल रहा है. इस मन्वंतर में सूर्यदेव ने देवमाता अदिति के गर्भ से जन्म लिया था और विवस्वान एवं मार्तण्ड कहलाए. इन्हीं की संतान वैवस्वत मनु हुए जिनसे सृष्टि का विकास हुआ है. शनि महाराज, यमराज, यमुना, और कर्ण भी इन्हीं की संतान हैं.

द्रौपदी ने भी रखा था छठ व्रत
छठ पर्व को लेकर एक और कथा प्रचलित है कि जब पांडव अपना सारा राजपाट जुए में हार गए, तब द्रौपदी ने छठ व्रत रखा था. तब उसकी मनोकामनाएं पूरी हुईं तथा पांडवों को राजपाट वापस मिल गया. लोक परंपरा के अनुसार सूर्य देव और छठी मईया का संबंध भाई-बहन का है. लोक मातृ का षष्ठी की पहली पूजा सूर्य ने ही की थी. महाभारत में ही छठ को लेकर एक और कथा प्रचलित है. दरअसल कुंती पांच पुत्रों की माता थी और छठी माता के रूप में उन्हें कलंकित होना पड़ा था. माता को कलंक से मुक्ति दिलाने के लिए कर्ण ने गंगा में सूर्य को अर्घ्य देना शुरू किया, जिसके बाद भगवान भास्कर कर्ण के पास आए और अंग की जनता के समक्ष उन्हें अपना पुत्र माना. इस प्रकार कुंती की पवित्रता कायम रही और वो कुंवारी मां के कलंक से मुक्त हो गई. इस प्रकार मूल रूप से कलंक या आरोप से मुक्ति की कामना के लिए छठ का व्रत रखा जाता है. मिथिला क्षेत्र में तो इस प्रकार की भी धारणाएं हैं कि छठ के दौरान पानी में खड़े होने मात्र से शरीर पर आए उजले दाग अथवा किसी प्रकार के चर्म रोग से छुटकारा मिल जाता है.

पुराण में इस बारे में एक और प्रचलित कथा के अनुसार, राजा प्रियवद को कोई संतान नहीं थी, तब महर्षि कश्यप ने पुत्र प्राप्ति के लिए यज्ञ कराकर प्रियवद की पत्नी मालिनी को यज्ञाहुति के लिए बनाई गई खीर दी. इसके प्रभाव से उन्हें पुत्र हुआ परंतु वह मृत पैदा हुआ. प्रियवद पुत्र को लेकर शमशान गए और पुत्र वियोग में प्राण त्यागने लगे. उसी वक्त भगवान की मानस कन्या देवसेना प्रकट हुई और कहा कि ‘सृष्टि की मूल प्रवृत्ति के छठे अंश से उत्पन्न होने के कारण मैं षष्ठी कहलाती हूं. राजन तुम मेरा पूजन करो तथा और लोगों को भी प्रेरित करो’. राजा ने पुत्र इच्छा से देवी षष्ठी का व्रत किया और उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई. यह पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को हुई थी.

मान्यता है कि छठ देवी भगवान भास्कर की बहन हैं और उन्हीं को प्रसन्न करने के लिए जीवन के महत्वपूर्ण अवयवों में सूर्य व जल की महत्ता को मानते हुए, इन्हें साक्षी मानकर कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को भगवान सूर्य की आराधना तथा उनका धन्यवाद करते हुए मां गंगा-यमुना या किसी भी पवित्र नदी या तालाब के किनारे अर्घ्य दिया जाता है. प्राचीन काल से ही इसे बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में ही मनाया जाता रहा है. लेकिन आज इस प्रान्त के लोग दुनिया में जहां भी रहते हैं वहां इस पर्व को उसी श्रद्धा और भक्ति से मनाया जाता है. इस लोकपर्व का संबंध बिहार के उस क्षेत्र से है, जो इतिहास के किसी दौर में महान सूर्योपासक रहा है. यह संबंध पूर्वी बिहार अथवा प्राचीन ‘अंग’ प्रदेश से जोड़ा जा सकता है.

छठ पर्व को अगर हम धार्मिक दृष्टि से हटकर व्यवहारिक दृष्टि से देखें तो छठ पर्व हमें जीवन का एक बड़ा रहस्य समझाता है. छठ पर्व के नियम पर गौर करें तो पाएंगे कि छठ पर्व में षष्ठी तिथि एवं सप्तमी तिथि में सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है. षष्ठी तिथि के दिन शाम के समय डूबते सूर्य की पूजा करके उन्हें फल एवं पकवानों का अर्घ्य दिया जाता है. जबकि सप्तमी तिथि को उदय कालीन सूर्य की पूजा होती है. दोनों तिथियों में छठ पूजा होने के बावजूद षष्ठी तिथि को प्रमुखता प्राप्त है क्योंकि इस दिन डूबते सूर्य की पूजा होती है.

वेद पुराणों में संध्या कालीन छठ पूर्व को संभवतः इसलिए प्रमुखता दी गयी है ताकि संसार को यह ज्ञात हो सके कि जब तक हम डूबते सूर्य अर्थात बुजुर्गों को आदर सम्मान नहीं देंगे तब तक उगता सूर्य अर्थात नई पीढ़ी उन्नत और खुशहाल नहीं होगी. संस्कारों का बीज बुजुर्गों से ही प्राप्त होता है. बुजुर्ग जीवन के अनुभव रूपी ज्ञान के कारण वेद पुराणों के समान आदर के पात्र होते हैं. इनका निरादर करने की बजाय इनकी सेवा करें और उनसे जीवन का अनुभव रूपी ज्ञान प्राप्त करें. यही छठ पूजा के संध्या कालीन सूर्य पूजा का तात्पर्य है.