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दरबार में राग अभी ज़ारी हैं...

विडंबना है कि पचास बरस से हम दरबार के अन्तःपुर से वाकिफ़ हो रहे हैं लेकिन नित नए दरबारों की कैद में अपने निजी स्वार्थ पूरे कर हम दरबारों के प्रभुत्त्व के विरुद्ध मुखर नहीं हो सके. 

दरबार में राग अभी ज़ारी हैं...

श्रेष्ठ कृतियां अपने ही समय में ठिठककर नहीं रह जातीं. वे अगले कई समयों को उतनी ही निस्संगता से व्याख्यायित करती हैं जितना अपने समकाल को. उनके कुछ पात्र भले ही किंचित बदल जाते हों, अब उसी रूप में दिखलाई न देते हों लेकिन उनका मूल चरित्र लगभग वही बना रहता है . इस अर्थ में श्रीलाल शुक्ल कृत उपन्यास राग दरबारी उल्लेखनीय कृति है .

ग्रामीण सामाजिक ढांचे के बीच सामंतवाद के अनुकूल माहौल को उपन्यासकार ने निपटता से रचा है. उपन्यास पढ़ते हुए हमें जो समस्याएं नज़र आती हैं, दरअसल उनमें से अधिकतम को उपन्यास के पात्र समस्याएं मानते ही नहीं हैं . इससे ज्यादा अनुकूल माहौल और क्या हो सकता है. शिवपालगंज के सामंत वैद्य जी क्या हैं, कितने हैं, और कहां तक हैं; यह कथा की समाप्ति पर ही पता चल पाता है. उपन्यासकार ने हालांकि भारतीय ग्रामीण समाज में वैद्य जी की चिरकालिक उपस्थिति का उद्घोष उनके परिचय के आरम्भ में ही कर दिया है –‘वैद्य जी थे, वैद्य जी हैं, वैद्य जी रहेंगे .’

यह उद्घोष इस उपन्यास का केन्द्रीय मर्म है और भारतीय ग्रामीण जीवन की भयावह त्रासदी, जिससे उबरने की आकांक्षा न तो उपन्यास में ही निर्णायक रूप से चरितार्थ हो सकी है और न ही आज के यथार्थ में ऐसी कोई सुगबुगाहट हो रही है .

शिवपालगंज दरअसल खुद ही एक चरित्र है .शक्तिशाली वर्ग को माई-बाप मानने को सहर्ष उत्कंठित लोगों से रचा-बसा गांव जिसमें सभी संस्थाएं,मान्यताएं,चलन वैद्यजी के द्वार से होकर गुज़र पाते हैं. अपनी दीनता से अलंकृत लोगों में दैन्य के विरुद्ध उतनी छटपटाहट नहीं जितनी वैद्यजी के समक्ष आत्मसमर्पण करने की होड़ है. गनीमत यही है कि वे अपने दीनता को पहचानते तो हैं. आत्मसमर्पण की इस मनोवृत्ति का पढ़े-लिखे होने से कोई रिश्ता नहीं क्योंकि अनपढ़ सनीचर और प्रिंसिपल इस मायने में एक हैं.

शिवपालगंज में भारत के किसी भी औसत गांव की तरह ही समस्याएं हैं .धूल-धक्कड़, कीचड़-दुर्गंध और ऊंच-नीच, दैन्य-शक्ति से गंधाते इस गांव में हर समस्या और मर्ज़ के एकमात्र उद्धारक की मान्यता वर्षों से वैद्य जी ने हथिया कर रखी है. देखने-बोलने मात्र से उनके विस्तार के विविध आयाम पता नहीं चल सकते. उनकी व्याप्ति को जानने के लिए सहकारी समिति, छिंगामल इंटर विद्यालय, पंचायत आदि के इतिहास और भूगोल की यात्रा करना पड़ती है. वे उन सामंती चरित्रों के प्रतीकमात्र हैं जो अपने व्यक्तित्त्व से सदा प्रसन्न और पर कल्याण के भाव को ही प्रकट करते हैं परन्तु वास्तव में इस दृश्य मुखौटे के भीतर अपने प्रभुत्त्व की प्रबल आकांक्षा हिलोरें मारती है.

वे हर जगह काबिज होना चाहते हैं. उन्हें यह भ्रान्ति भी आश्वस्ति की हद तक रहती है कि व्यवस्था नाम की कोई चीज़ यदि शिवपालगंज में कायम है तो उन्हीं की वजह से. बद्री पहलवान अपने पहलवानी दांव-पेंच से और रुप्पन अपने लड़कपन भरी हरकतों से अपने पिता वैद्य जी को यथासंभव परेशानी में डालते ज़रूर हैं लेकिन वैद्य जी उन्हीं के माध्यम से और सनीचर जैसे सेवकों की चिर चापलूसी से अपने प्रभुत्व के जाल को फैलाए रखते हैं. रंगनाथ वैद्यजी के भानजे हैं और शोधार्थी हैं. रंगनाथ, रुप्पन तथा खन्ना मास्टर ने गांव की संकीर्ण आबोहवा में कुछ चहल पहल अपनी हरकतों और कुछ बातचीत के विषयों से ज़रूर उत्पन्न की है.

वैद्यजी के यहां कुछ नियमित दरबारी हैं .उनके दरबार में अनेक विषयों पर अनेक चर्चाएं कुछ इस गंभीरता से होती रहतीं हैं कि यदि ये नहीं हुईं तो दुनिया में बड़ा भारी संकट उत्पन्न हो जाएगा. सारी दरबारी चर्चाओं की तरह ही यहां की चर्चाओं के आदि और अंत का अंतिम नियंत्रण चूंकि वैद्यजी के पास ही है इसलिए उनका अंतिम लक्ष्य वैद्यजी के प्रभुत्व में विस्तार तक ही केन्द्रित रहने को अभिशप्त रहता है.

तमाम निरंतर गतिशील समस्याओं के बीच शिक्षा और भ्रष्टाचार पर इस उपन्यास में बड़ा ही मार्मिक और व्यंग्यपूर्ण वर्णन मिलता है. शिक्षा जो एक तरह से साक्षरता का ही थोड़ा सा विस्तार बनकर रह गई है, उसकी गांवों में औपचारिक उपस्थिति और शिक्षकों द्वारा सामंती व्यवस्था की चाटुकारिता का अनैतिक वृत्तान्त इस व्यवस्था के पतन का साक्ष्य है .आज के हालात इससे भिन्न कहां हैं?

इन्हीं सबके बीच लंगड़ का मिसिल को हासिल करने का ईमानदार प्रयास घिसटता हुआ दिखाई देता है. हमें ऐसे प्रयासरत लंगड़ अपने आसपास आज भी मिल जाएंगे. पराजित लेकिन ज़िद पर कायम और हमारी स्वार्थी चपलता को संशय से घूरते हुए .

दरबार में राग अभी ज़ारी हैं, विडंबना है कि पचास बरस से हम दरबार के अन्तःपुर से वाकिफ़ हो रहे हैं लेकिन नित नए दरबारों की कैद में अपने निजी स्वार्थ पूरे कर हम दरबारों के प्रभुत्त्व के विरुद्ध मुखर नहीं हो सके. 

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)