close

खास खबरें सिर्फ आपके लिए...हम खासतौर से आपके लिए कुछ चुनिंदा खबरें लाए हैं. इन्हें सीधे अपने मेलबाक्स में प्राप्त करें.

ZEE जानकारी: जानें, मुसलमानों के नाम पर जारी वोट बैंक की राजनीति का सच!

क्या सिर्फ़ कुछ मुस्लिम चेहरों को मंत्री बना देने से और सड़कों के नाम मुसलमानों के नाम पर रख देने से देश के 20 करोड़ मुसलसमानों का भला हो सकता है.

ZEE जानकारी: जानें, मुसलमानों के नाम पर जारी वोट बैंक की राजनीति का सच!

देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय यानी मुसलमानों की हालत पर एक बार फिर बहस छिड़ गई है. इसलिये आज हम मुसलमानों पर होने वाली गटर Politics का एक DNA टेस्ट आप के लिए कर रहे हैं. भारत की राजनीति में मुसलमानों की जगह सिर्फ़ इफ़्तार में टोपी और अरबी रूमाल पहनने वाले नेताओं तक ही सीमित है.

क्या सिर्फ़ कुछ मुस्लिम चेहरों को मंत्री बना देने से और सड़कों के नाम मुसलमानों के नाम पर रख देने से देश के 20 करोड़ मुसलसमानों का भला हो सकता है. ये मुसलमानों की भलाई का वो राजनीतिक फॉर्मूला है, जिसे आप मुस्लिम तुष्टिकरण और वोट बैंक की राजनीति कह सकते हैं. अब इसे बदलने की गंभीर कोशिश की जा रही है.

कल लोकसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुसलमानों को लेकर कांग्रेस की गटर राजनीति का ज़िक्र किया था. उन्होंने शाह बानो केस की बात करते हुए राजीव गांधी की सरकार के एक मंत्री का विवादित बयान संसद में दोहराया था. प्रधानंमत्री मोदी ने अपने भाषण में एक इंटरव्यू का ज़िक्र किया..और बताया कि राजीव गांधी सरकार के एक मंत्री ने कहा था कि मुसलमानों के उत्थान की ज़िम्मेदारी कांग्रेस की नहीं है, अगर वो गटर में रहना चाहते हैं तो रहें. हालांकि प्रधानमंत्री ने सदन को नहीं बताया कि ये बयान कांग्रेस के किस मंत्री का है. उन्होंने कांग्रेस की आपत्ति पर कहा कि उनको इस इंटरव्यू का Youtube Link दे दिया जाएगा.

लेकिन आज हमारे पास वो इंटरव्यू है, जो प्रधानमंत्री की बात को सत्यापित करता है. आज, एक पूर्व मंत्री आरिफ़ मोहम्मद ख़ान भी सुर्ख़ियों में हैं...

वो तब राजीव गांधी सरकार में राज्य मंत्री थे. उन्होंने एक पुराने इंटरव्यू में बताया था कि उनके साथी मंत्री रहे PV नरसिम्हा राव ने उनसे क्या कहा था. आपको प्रधानमंत्री मोदी की बात की पुष्टि करने वाले इस जवाब को ग़ौर से सुनना चाहिये.

इस इंटरव्यू में आरिफ़ मोहम्मद ख़ान ने बताया था कि वर्ष 1986 में उनके साथी मंत्री रहे नरसिम्हा राव ने शाह बानो केस को लेकर उनसे मुलाक़ात की थी..और कहा था कि मुसलमान अगर गटर में पड़े रहना चाहते हैं तो उन्हें पड़ा रहने दो. आरिफ़ मोहम्मद ख़ान ने शाह बानो केस में सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला बदले जाने का विरोध किया था...और पद से इस्तीफ़ा दे दिया था. उनकी बात संसद में दिये गये प्रधानमंत्री मोदी के बयान को सत्यापित करती है.

आज Zee News ने भी आरिफ़ मोहम्मद ख़ान से बात की है और उन्होंने एक बार फिर इस बात की पुष्टि की है...कि 1986 में जब उन्होंने शाह बानो केस को लेकर मंत्री पद से इस्तीफ़ा दिया था...तब PV नरसिम्हा राव उन्हें मनाने आये थे. और उनसे कहा था कि हम यानी कांग्रेस राजनीति के बिज़नेस में हैं...और अगर मुसलमान गटर में पड़े रहना चाहते हैं तो उन्हें पड़ा रहने दो. 

शाह बानो केस को लेकर आज भी कांग्रेस से जब सवाल होते हैं तो उसके पास तर्क वाले जवाब नहीं होते.

1986 में राजीव गांधी ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला बदल दिया था. ये कांग्रेस पर मुस्लिम तुष्टीकरण का वो दाग़ था...जो आज भी उतना ही गहरा और काला है जो 33 वर्ष पहले था.

एक मुस्लिम महिला शाह बानो को 62 साल की उम्र में उनके पति ने 1978 में तलाक दे दिया था. तब सुप्रीम कोर्ट ने शाह बानो के पति को उन्हें गुज़ारा भत्ता देने का आदेश दिया था. देश की सबसे बड़ी अदालत ने उस समय की राजीव गांधी सरकार को देश के सभी नागरिकों के लिए Uniform Civil Code बनाने का भी सुझाव दिया था.

राजीव गांधी के पास उस समय ऐतिहासिक बहुमत था. उनकी पार्टी ने लोकसभा की 404 सीटें जीतकर सबसे बड़ा बहुमत हासिल किया था. वो चाहते, तो सुप्रीम कोर्ट के सुझाव पर अमल कर सकते थे. देश की मुस्लिम महिलाओं को उनका हक़ दिला सकते थे. वो देश में समान नागरिक संहिता लागू करने की दिशा में क़दम बढ़ा सकते थे. लेकिन उस वक्त भारत के रूढ़िवादी मुसलमानों ने इस फैसले का विरोध किया. उनका कहना था कि वो अपने Personal Laws में किसी का दख़ल बर्दाश्त नहीं करेंगे. और, उनके दबाव में राजीव गांधी की सरकार ने मुस्लिम समाज के सुधार का एक मौक़ा गंवा दिया था.

इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ 1986 में राजीव गांधी की सरकार एक Bill लाई...और सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलट दिया गया. यानी राजीव गांधी की सरकार तब मुस्लिम कट्टरपंथियों के सामने झुक गई. और मुस्लिम महिलाओं को गुज़ारा भत्ता देने का जो अधिकार सुप्रीम कोर्ट ने दिया था, उसे छीन लिया.

आरिफ़ मोहम्मद ख़ान ने 23 अगस्त 1985 को संसद में इस बिल का विरोध करते हुए 26 Page का लंबा भाषण दिया था...करीब एक घंटे के अपने भाषण में उन्होंने क़ुरान की आयतों का हवाला देकर ये साबित करने की कोशिश की थी कि इस्लामिक धर्म ग्रंथों में कहीं भी गुज़ारा भत्ता देने से मना नहीं किया गया है. बल्कि तलाक़ के बाद भी महिला का सम्मान करने की बात लिखी है. हमने संसद की लाइब्रेरी से उनके भाषण की कॉपी निकलवाई है. इसकी कुछ ख़ास बातें हम आपको बताना चाहेंगे.

आरिफ़ मोहम्मद ख़ान ने आज ज़ी न्यूज़ को बताया है कि इस्तीफ़े के अगले दिन संसद में कांग्रेस के कई मंत्री उनसे मिले...और उनसे इस्तीफ़ा वापस लेने के लिये कहा. उनसे कहा गया कि वो सैद्धांतिक तौर पर सही हैं...लेकिन उनके विरोध से कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ जाएंगी.

इसके बाद राजीव गांधी सरकार के एक और मंत्री नरसिम्हा राव ने उनसे कहा कि वो बहुत ज़िद्दी हैं. अब तो शाह बानो ने भी अपना स्टैंड बदल लिया है. ज़ाहिर है शाह बानो केस में सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला पलटना कांग्रेस की तुष्टिकरण वाली राजनीति थी. 

कांग्रेस पर हमेशा मुसलमानों से धोखे वाली राजनीति का आरोप लगा है. लेकिन वो बीच-बीच में कुछ ऐसे संकेत भी देती रही है ताकि मुस्लिम वोट बैंक उससे ख़ुश रहे.

1975 में लगी इमरजेंसी की सबसे ज़्यादा डराने वाली यादें नसबंदी अभियान से जुड़ी हैं. तब क़रीब 62 लाख लोगों की नसबंदी की गई थी. इनमें बड़ी तादाद में मुसलमान थे.

नसबंदी से नाराज़ मुसलमानों को ख़ुश करने के लिए इंदिरा गांधी ने संविधान की प्रस्तावना में धर्मनिरपेक्ष शब्द शामिल किया था. जबकि वर्ष 1950 में बनाये गये संविधान में Secular शब्द शामिल नहीं था.

19 सितंबर 2008 को दिल्ली के बाटला हाउस में आतंकवादियों का एनकाउंटर हुआ था. इस मुठभेड़ में दिल्ली पुलिस के इंस्पेक्टर मोहन चंद्र शर्मा शहीद हो गए थे.
लेकिन कांग्रेस के नेता दिग्विजय सिंह ने मुसलमानों को खुश करने के लिए पूरे एनकाउंटर को ही फ़र्ज़ी बता दिया था. 

जुलाई 2018 में एक उर्दू अख़बार इंक़लाब ने दावा किया था कि, मुस्लिम बुद्धिजीवियों के साथ बात करते हुए राहुल गांधी ने कांग्रेस को मुसलमानों की पार्टी बताया है. उसी अख़बार में कांग्रेस के अल्पसंख्यक मोर्चे के प्रमुख रहे नदीम जावेद का भी इंटरव्यू छपा, जिसमें उन्होंने इस बात की पुष्टि की थी.

आज़ादी के बाद से मुसलमानों को इस देश का नागरिक कम और वोट बैंक ज़्यादा माना गया है. और कांग्रेस इस वोट बैंक पर सबसे बड़ा दावा करती रही है. कांग्रेस हर चुनाव में ख़ुद को उनका हमदर्द बताती है. उनको सुरक्षा देने की बात करती है. लेकिन सच्चाई ये है कि कांग्रेस की सरकारों के दौरान ही देश में सबसे ज़्यादा दंगे हुए हैं.

पंडित जवाहर लाल नेहरू जब प्रधानमंत्री थे, तब उनके कार्यकाल में देश भर में 243 दंगे हुए थे. पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के पूरे कार्यकाल में 337 दंगे हुए. राजीव गांधी सिर्फ एक बार प्रधानमंत्री बने, लेकिन उनके पांच साल के कार्यकाल में 291 दंगे हुए. वहीं वर्ष 2004 से 2013 तक केंद्र में UPA यानी कांग्रेस की ही सरकार थी. इस दौरान पूरे देश में छोटे बड़े मिलाकर 7480 दंगे हुए. 

कांग्रेस की सरकारें इन दंगों को रोकने में नाकाम रहीं. इन दंगों में बड़ी तादाद में मुसलमानों की भी जान गई थी. लेकिन कांग्रेस आज भी मुसलमानों को सांप्रदायिकता वाला डर दिखाती है.

अप्रैल 2018 में कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी गए थे. वहां एक छात्र ने उनसे दंगों पर सवाल पूछ लिया था. तब सलमान खुर्शीद ने भी माना था कि कांग्रेस के दामन पर मुसलमानों के खून के दाग़ हैं. 

वैसे तो 1947 में देश के बंटवारे के साथ ही भारत के मुसलमानों को भी बांट दिया गया था. लेकिन उसके बाद बनीं कांग्रेस की सरकारों ने भी मुसलमानों का ख़ूब राजनीतिक शोषण किया. ये कांग्रेस की सांप्रदायिक राजनीति थी. क्योंकि आज़ादी के बाद हिंदुओं के लिए संविधान के मुताबिक कानून बनाए गए.

लेकिन मुसलमानों को Personal Law और शरीयत का पालन करने की छूट दी गई . यानी उनके लिये अलग क़ानून था और देश के बाक़ी लोगों के लिये अलग क़ानून. ये धर्म का वो लॉलीपॉप था जो कांग्रेस ने आज़ादी के बाद मुसलमानों को थमा दिया था.

कभी उनके लिये इफ़्तार पार्टी दे दी गई. कभी किसी मुस्लिम नेता के नाम पर सड़क का नाम रख दिया गया. कभी इस्लामिक त्योहारों को लेकर सरकारी छुट्टी घोषित कर दी गई. बहुत ज़्यादा किया तो कुछ मुस्लिम चेहरों को मंत्री बना दिया गया. आज़ादी के 72 सालों बाद भी मुसलमानों को लेकर सांकेतिक राजनीति की जा रही है. जबकि उन्हें देश के बाक़ी नागरिकों की तरह बिजली चाहिये, पानी चाहिये और रोज़गार भी चाहिये.

लेकिन इसके बदले मुस्लिम तुष्टिकरण करने वाले नेताओं ने उनके साथ फोटो खिंचवाकर काम चला लिया...आज नये दौर में वो उनके साथ Selfie ले लेते हैं. मुसलमानों को भी लगा कि उनके अधिकार बढ़ रहे हैं. उनका महत्व बढ़ रहा है. लेकिन हक़ीक़त ये थी कि वो लगातार मुख्य धारा से कटते गये.

उनकी अलग शिक्षा व्यवस्था को बढ़ावा दिया गया . आज़ादी के बाद भी मदरसों के पाठ्यक्रम को Update नहीं किया गया . मुसलमान लगातार आधुनिक शिक्षा से दूर होते चले गए . इसलिए नौकरियों में भी उनके लिए मौके घटते गए और उनका आर्थिक और सामाजिक विकास भी रुक गया. 

भारत में आज क़रीब 20 करोड़ मुसलमान हैं...और इनमें 31 प्रतिशत अनपढ़ हैं.
आज भी सिर्फ 3 प्रतिशत मुसलमान ही कॉलेज की पढ़ाई पूरी कर पाते हैं.
क़रीब 32 प्रतिशत मुस्लिम महिलाएं कभी स्कूल ही नहीं गई हैं. 
वर्ष 2011 की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ मुसलमानों में बेरोज़गारी की दर SC/ST वर्ग से भी ज़्यादा है.
और मुसलमानों की 31 प्रतिशत आबादी ग़रीबी रेखा के नीचे है. 
मुसलमानों की क़रीब 25 प्रतिशत आबादी आज भी मेडिकल सुविधाओं से दूर है. 

देश में मुस्लिम समुदाय की आर्थिक, सामाजिक और शैक्षिक स्थिति को जानने के लिये वर्ष 2005 में मनमोहन सरकार ने एक कमेटी बनाई थी. जस्टिस राजिंदर सच्चर के नेतृत्व में बनी इस 7 सदस्यीय कमेटी ने वर्ष 2006 में अपनी रिपोर्ट में बताया कि देश में मुसलमानों की स्थिति अन्य समुदायों की तुलना में काफ़ी ख़राब है.

दुर्भाग्य की बात ये है कि मुसलमानों की इन कमियों को वोट बैंक की राजनीति करने वालों ने उनकी खूबी बताकर पेश किया. 

कांग्रेस के अलावा उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल के क्षेत्रीय दलों ने मुसमलानों को वोट बैंक बनाकर उनको अलग पहचान देने की कोशिश की. इसी वजह से मुसलमान, लगातार पिछड़ते गए और किसी ने मुसलमानों के मसीहा बनने वाले नेताओं से सवाल भी नहीं किया. उन्हें आज भी ये समझाने की कोशिश की जाती है कि उनका विकास इस बात पर निर्भर करता है कि उनके प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, सांसद या विधायक का धर्म क्या है.

अगर भारत को सुपरपावर बनना है, तो देश के 20 करोड़ मुसलमानों को छोड़कर भारत के विकास की कल्पना करना असंभव है. इसीलिए आज भारत के मुसलमानों को एक सामाजिक क्रांति की ज़रूरत है . और इस क्रांति से तुष्टिकरण करने वाले नेताओं और पार्टियों को दूर रखना होगा. उन्हें कांग्रेस जैसे दलों की गटर वाली राजनीति का बहिष्कार करना होगा.