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Lok sabha chunav results 2019: अगर NDA जीता तो सबसे ज्यादा दुखी होंगे ये 5 नेता!

अगर वास्तविक रिजल्ट (Chunav result) में भी एक्जिट पोल (EXIT POLL) के नतीजे सही साबित होते हैं तो देश ये पांच नेता सबसे ज्यादा दुखी होंगे. ये पांच नेता ऐसे हैं जिन्होंने चुनाव से ठीक पहले खुद को एनडीए से अलग कर लिया था.

Lok sabha chunav results 2019: अगर NDA जीता तो सबसे ज्यादा दुखी होंगे ये 5 नेता!
Lok sabha election results 2019 : सारे एक्जिट पोल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दोबारा से सत्ता में आते दिख रहे हैं.

नई दिल्ली: लोकसभा चुनाव 2019 (Lok sabha elections 2019) अपने आखिरी पड़ाव में पहुंच चुका है. आज वोटों की गिनती होगी. कुछ ही देर में वोटों की गिनती के रुझान आने शुरू हो जाएंगे. न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया की नजरें भारत के लोकसभा चुनाव के रिजल्ट (Lok sabha election results 2019) पर टिकी हुई है. वोटों की गिनती के बाद साफ हो जाएगा कि अगले पांच साल और देश में एनडीए (NDA) की सत्ता रहेगा या विपक्षी खेमे को सरकार बनाने का मौका मिलेगा. विभिन्न न्यूज चैनलों और सर्वे एजेंसियों की ओर से किए गए एक्जिट पोल में बीजेपी (BJP) नीत एनडीए आसानी से सरकार बनाने के जादुई आंकड़े को पार करता दिख रहा है. अगर वास्तविक रिजल्ट (Chunav result) में भी एक्जिट पोल (EXIT POLL) के नतीजे सही साबित होते हैं तो देश ये पांच नेता सबसे ज्यादा दुखी होंगे. ये पांच नेता ऐसे हैं जिन्होंने चुनाव से ठीक पहले खुद को एनडीए से अलग कर लिया था.

ओम प्रकाश राजभर: उत्तर प्रदेश में 2017 के विधानसभा चुनाव के दौरान सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) एनडीए का हिस्सा बना था. बीजेपी के साथ मिलकर इस पार्टी ने अच्छा प्रदर्शन किया था. सुभासपा के अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर को यूपी की योगी आदित्यनाथ की सरकार में मंत्री पद भी मिला था. ओम प्रकाश राजभर लोकसभा चुनाव में अपनी पार्टी के लिए टिकट चाहते थे, लेकिन बीजेपी के आलाकमान उनकी मांग को ठुकरा दी. बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह से मुलाकात के बाद ओम प्रकाश राजभर चार चरणों की वोटिंग तक बीजेपी और एनडीए के लिए वोट मांगते रहे, लेकिन पांचवे चरण से पहले अचानक से बीजेपी पर हमलावर हो गए. छठे चरण आते-आते योगी सरकार से इस्तीफा दे दिया. सातवें चरण की वोटिंग संपन्न होते ही वे योगी सरकार से बर्खास्त कर दिए गए. अगर एनडीए जीतता है तो उन्हें पछतावा होना स्वभाविक है.

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उपेंद्र कुशवाहा: 2014 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले नीतीश कुमार ने पीएम नरेंद्र मोदी का विरोध करते हुए एनडीए से नाता तोड़ लिया था. इसके बाद बीजेपी ने बिहार में मजबूती के लिए उपेंद्र कुशवाहा और रामविलास पासवान की पार्टी से गठबंधन किया था. साल 2018 में नीतीश कुमार दोबारा से एनडीए का हिस्सा बन गए. इसके बाद से एनडीए में उपेंद्र कुशवाहा की हैसियत घट गई. 2019 के लोकसभा चुनाव में बिहार में जब सीटों के बंटवारे की बात आई तो उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी को केवल एक सीट दिया जा रहा था. इस बात से नाराज होकर उपेंद्र कुशवाहा ने केंद्र में मंत्री पद को त्याग दिया और एनडीए से अलग होकर राष्ट्रीय जनता की दल की अगुवाई वाले महागठबंधन का हिस्सा बन गए. अगर एनडीए जीतता है तो फिलहाल उपेंद्र कुशवाहा के फैसले को राजनीति में गलत कहा जाएगा.

जीतन राम मांझी: 2016 में हुए बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान नीतीश कुमार के खेमे में बेइज्जत हुए पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी एनडीए का हिस्सा बने थे. एनडीए को उम्मीद थी की मांझी मांझी के आने से एनडीए के प्रत्याशियों को महा दलित समाज का वोट मिलेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. 2018 में पीएम नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार की दोस्ती दोबारा होने पर एनडीए में मांझी की खास हैसियत नहीं रह गई थी. इसके बाद मांझी आरजेडी नीत महागठबंधन में आ गए. एनडीए के जीतने पर मांझी को पछतावा होना स्वभाविक है.

चंद्रबाबू नायडू: आंध्र प्रदेश में सत्तासीन तेलगु देशम पार्टी (टीडीपी) ने लोकसभा चुनाव से कुछ महीने पहले एनडीए से अलग होने का फैसला किया था. दरअसल, आंध्र प्रदेश में लोकसभा के साथ विधानसभा के चुनाव भी हुए हैं. टीडीपी को एनडीए में बनाए रखने के लिए बीजेपी ने काफी कोशिशें भी की थी, लेकिन टीडीपी प्रमुख चंद्रबाबू नायडू ने एक ना सुनी. इस बार टीडीपी कांग्रेस के साथ मिलकर दोनों चुनाव लड़ी है. लोकसभा चुनावों के एक्जिट पोल में टीडीपी की हालत खराब बताई जा रही है. हालांकि विधानसभा चुनावों के दो एक्जिट पोल में भी चंद्रबाबू नायडू की पार्टी के हारने का अनुमान लगाया गया है. एनडीए से अलग होने के बाद से चंद्रबाबू नायडू विपक्षी नेताओं को एकजुट करने में जुटे हैं. अगर लोकसभा चुनाव (Lok sabha chunav results) में एनडीए जीतती है तो चंद्रबाबू नायडू का एनडीए से अलग होने के फैसले पर सवाल खड़े हो सकते हैं.

महबूबा मुफ्ती: साल 2014 में जम्मू कश्मीर में हुए विधानसभा चुनावों में किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था. इसके बाद विचारधारा के मामले में बिल्कुल ही उलट बीजेपी और महबूबा मुफ्ती की पार्टी पीडीपी ने गठबंधन करके सरकार बनाई थी. इस सरकार में पीडीपी के मुख्यमंत्री और बीजेपी के उपमुख्यमंत्री थे. केंद्र की बीजेपी सरकार के बार-बार आगाह करने पर भी सीमा पार से बढ़ रही आतंकी घटनाओं पर मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती की नरमी बरकरार रही. आखिरकार बीजेपी ने सरकार गिरा दी. अगर इस बार एनडीए सत्ता में आती है तो महबूबा को शायद अपने फैसले पर पछतावा होगा.