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कृष्णा सोबती: स्त्री की आजादी और साहित्यकार के संघर्ष की लंबी कहानी

रेणु की तरह कृष्णा जी अपने उस जमाने की उपज हैं जिसकी मिट्टी और पानी से उनका जीवन सजा-संवरा है. यह कृतज्ञता इतनी गहरी है कि वे बार-बार उसका कर्ज चुकाने को उद्यत जैसी रहती हैं, ठीक रेणु की तरह.  

कृष्णा सोबती: स्त्री की आजादी और साहित्यकार के संघर्ष की लंबी कहानी

कभी-कभी एक लेखक का जाना समूची लेखकीय संस्कृति का जाना महसूस होता है. कृष्णा सोबती इस रूप में सचमुच एक संस्कृति थीं. दुष्यंत कुमार की यह पंक्ति उनके संदर्भ में सटीक बैठती है कि लेखक व्यक्ति नहीं एक पूरी समष्टि होता है. किसी लेखक साथी ने उनके बारे में ठीक ही कहा कि वे उनमें से थीं जो समूची भारतीय भाषाओं के बीच भी विरल कही जा सकती हैं.  

आजादी मिलने से कुछेक वर्ष पहले, उन्होंने लिखना शुरू किया जिसका अनुभव क्षेत्र पंजाब का वह सामाजिक जीवन आता है जिसके दायरे में मध्यमवर्गीय परिवार आते हैं. अपनी शुरुआती कहानियों - 'सिक्का बदल गया', 'बादलों के घेरे', 'आजादी शम्मो जान की' से उन्होंने अपनी जो पहचान बनाई, धीरे-धीरे वह और गाढ़ी और आकर्षक होती गई. पर जल्द ही उनकी रचनात्मकता उस शिखर की ओर मुंह करके खड़ी हो गई जिधर उसी के लिए जाना संभव हो पाता है जिसमें अनुभवों के नायाब ठिकानों के साथ-साथ शब्दों के अनोखे पौरुष भी हुआ करते हैं.  

लेखकों के अभावों को हाईलाइट करने का चलन जिन दिनों खूब जोरों पर था, एक प्रश्नकर्ता का मुंह सा बंद करते हुए उन्होंने कहा था कि लेखक की अभावग्रस्तता तब शुरू होती है जब उसके जीवन में अनुभवों की कमी और विचारों का टोटा होने लगता है. फिर लेखक तो वही है जिसकी कलम किसी मूल्य के लिए लिखती है.  

कुल सत्रह रचनाओं- जिनमें कई चर्चित कहानियां, अविस्मरणीय उपन्यास, महत्वपूर्ण रेखाचित्र/संस्मरण, यात्रा वृतांत शामिल हैं, में कृष्णा जी यह स्थापित करने में कामयाब हो सकी हैं कि वे परिमाण में नहीं, गुणात्मक प्रवरता में यकीन रखती हैं और ऐसा करने के लिए वे जितने धैर्य से काम लेती हैं, उतने ही अटूट साहस से वह मानती रही हैं कि लेखक की प्रत्येक कृति उसकी रचनात्मकता की गाढ़ी कमाई है. दूसरे शब्दों में, जिंदगी की भारी कीमतें चुकाकर उपलब्ध की गई सृष्टि है. इसे उन्होंने अपने उपन्यास 'डार से बिछुड़ी' (1958) , मित्रो मरजानी (1967), सूरखमुखी अंधेरे के (1972), जिंदगीनामा (1979) से लेकर यारों के यार, तिन पहाड़ (1968) जैसी रचनाओं से सिद्ध कर दिखाया है.  

रेणु की तरह कृष्णा जी अपने उस जमाने की उपज हैं जिसकी मिट्टी और पानी से उनका जीवन सजा-संवरा है. यह कृतज्ञता इतनी गहरी है कि वे बार-बार उसका कर्ज चुकाने को उद्यत जैसी रहती हैं, ठीक रेणु की तरह.  

अगर उनके लेखन को लेकर कोई एक ही खास बात कहने की नौबत आ पड़े तो फिर बेहिचक कहना होगा कि वे स्त्री के साहस और ईमानदार मनोविज्ञान की लेखिका हैं. वे स्त्री और व्यवस्था के संबंधों को भी जानती हैं और उसके साथ घटती आई ज्यादातियों को भी. पर सबसे ऊपर वे उसके अटूट साहस और संघर्षजीविता की भी लेखिका हैं. उनकी स्त्री न तो कभी हारती है, न हार मान लेने को कभी राजी है. प्रत्येक हार को जीत में बदल लेने वाला उसका मन उनके लेखन का आधार सत्य है. जिजीविषा किसे कहते हैं, इसे उनके उपन्यास 'डार से बिछुड़ी' में भी देखा जा सकता है. 'मित्रो मरजानी', 'सूरजमुखी अंधेरे के' में भी. 'ऐ लड़की' में तो स्त्री जीवन की सिद्धांत कथा जैसे कह दी गई हो. आश्चर्य तो तब होता है जब वे 'यारों के यार' जैसी कहानियों में आसपास के समकालीन जीवन के मुंहफट यथार्थ में प्रवेश कर पाठकों को चौंकाती नहीं बल्कि यह भरोसा पैदा करती हैं कि वे पूरे समय और समाज की लेखिका हैं गोया कि उनकी प्राथमिकताएं अलग हैं. फिर भी अगर वे चाह लें तो कई अवांगर्द यथार्थवादियों के होश दुरुस्त कर सकती हैं. उनमें यह चमत्कारी समर्थता खूब है.  

'जिंदगीनामा' वस्तुत: एक प्रामाणिक समाजनामा है जो ऐसा इतिहास है जो लोकमानस की भागीरथी के साथ बहता, पनपता और फैलता है और जन सामान्य के सांस्कृतिक पुख्तापन में जिंदा रहता है. आलोचकों की भाषा में, बीसवीं शाताब्दी के प्रथम पंद्रह वर्षों में पंजाब के किसानों-ग्रामीणों के जीवन का आख्यान है. यह भी सही है कि इसमें चरित्रों को नहीं, उस कालखंड को अहमियत सौंपी गई है जिसमें अनेकजन अपनी पात्रता को चरित्र के रूप में चरितार्थ करते हैं. 'जिंदगीनामा' इस अर्थ में कृष्णा जी का अलग किस्म का रचनात्मक दस्तावेज है.  

इन अनेक कृतियों और उनके चरित्रों की बनावट से गुजरकर यह कहने का सुख तो मिल ही जाता है कि सृजनशीलता का दूसरा नाम कृष्णा सोबती है. यों भी उन्होंने हम लेखकों को सिखाया कि दुहराव से बचकर ही सृजनशीलता की रक्षा संभव है. एक ही कहानी को जिसको बार-बार कहना या फिर कई-कई अनुभवों को पहले के कहे हुए ढंग से दुहराना, कोई सृजन नहीं है. प्रश्न चाहे भाषा और मुहावरों का हो या फिर शिल्प का प्रत्येक बार मौलिकता अथवा अपूर्वता की मांग करता है. सच तो यह है कि कृष्णा सोबती को पढ़ना सीधे जिंदगी से बात करना है. उनके शब्द किसी घटना की तरह घटते हैं और हम उसके हिस्से बनते चले जाते हैं. 
  
सच तो यह है कि वे कथा नहीं कहतीं उस जिंदगी को रचती हैं जो समय के अनुभवों से फूटती है और फिर किसी सिलसिले की तरह चलती चली जाती है.  

एक कुशल कथा-शिल्पी की तरह वे अपने शिल्प को जिस तरह गढ़ती हैं, वह जैसे कोई कथा न हो नाटक के अंक और दृश्य हों जिनमें सारा वर्णित नहीं चित्रित जीवन व्यापार हो और घटनाओं के मानिंद घट रहा हो. वो मानती थीं कि कथा में इतना सामर्थ्य हो कि कथाकार की क्षमताओं और कुशलताओं का आईडेंटिटी कार्ड बन सके.  

यों उनकी भाषा को लेकर जबर्दस्त चख-चख रही है. अज्ञेय जैसों ने तो यहां तक कह दिया कि वे जब हिंदी में लिखेंगी तब वे (उन्हें) पढ़ेंगे. पर कृष्णा जी से अधिक किसे मालूम कि मिट्टी के साथ भाषा अपने आप उठती-बैठती, चली आती है. पात्रों में नई जिंदगी पाती है और विवरणों में सजीवता का वैभव रच पाठकों को सही ठिकानों तक पहुंचा भी आती है.  

अपने इसी पुरुषार्थ के बल पर बगैर कोई संघ गहे और लॉबी बनाए, कृष्णा जी ने अपनी जो प्रतिष्ठा-महिमा रची है, वह हम लेखकों को यह संदेश देने के लिए काफी है कि आत्मसाधना के यज्ञ में धूनी रमाकर बैठना जमाने का लेखक साबित होने के लिए कितना जरूरी है. हमें अपने अनुभवों के प्रति ईमानदार तो रहना ही है, अपने शब्दों को साहस से परिभाषित भी करते चलना है. सतत्‌ मूल्य-सजगता, शब्द-साहस और ईमानदारी - यही लेखक की पहचान है. कृष्णा जी यही थीं और उन्हें याद करते हुए हमें यही होने की साधना करनी है.

(डॉ. विजय बहादुर सिंह, हिंदी के प्रसिद्ध लेखक और आलोचक हैं)

(डिस्क्लेमर: इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)

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