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डियर जिंदगी: चलिए, माफ किया जाए!

प्रेम को बचाए, बनाए रखने के लिए हमेशा जान देने की जरूरत नहीं होती, उसे ‘शांतिकाल’ में भी स्‍नेह चाहिए. माफी की आदत जितनी जल्‍दी हमारा स्‍वभाव बनेगी, हम तनाव, कुंठा से उतनी जल्‍दी बाहर निकलेंगे.

डियर जिंदगी: चलिए, माफ किया जाए!

मन कैसे कुंठा से दूर 'अकुंठ' बना रहे. इसे हल्‍का रखने का सबसे अच्‍छा उपाय क्‍या है. तनाव की छाया जीवन के आंगन से दूर कैसे रहे. मन कैसे उन चीज़ों से दूर, उन ख्‍यालों से न मिले जो उसमें कुंठा भरते हैं! ‘डियर जिंदगी’ को नए बरस में सबसे अधि‍क सवाल रिश्‍तों को लेकर मिल रहे हैं. रिश्‍तों में भी एक दूसरे के प्रति अविश्‍वास, प्रेम की कमी और तनाव के बाद एक दूसरे से नाराजगी को लादे रहने को लेकर बात सबसे ज्‍यादा हो रही है.

रिश्‍तों में नाराजगी स्‍वाभाविक चीज़ है. हम अनजान व्‍यक्ति से नाराज़ नहीं होते. उससे ही होते हैं, जिससे कभी प्रेम रहा हो. इसका अर्थ हुआ कि नाराजगी के पहले उसके प्रति मन में गहरा प्रेम था, जिसके जिक्र से आज ‘कलेजा छलनी’ हो जाता है. एक दूसरे को बड़ी चीज़ों के लिए धोखा देने, ठगने की बातें हम जमाने भर से सुनते आए हैं, लेकिन अब सब बदल गया.

डियर जिंदगी: शोर नहीं संकेत पर जोर!

अब तो किस्‍सा यूं होता है कि कब आप मोबाइल के पासवर्ड के लिए झगड़ पड़ें और कब फेसबुक के स्‍टेटस के लिए. कोई ठिकाना नहीं, कब एक दूसरे के लिए गहरा प्रेम, तनाव की झील में हिलोरें लेने लगे!

हम जहां रहेंगे, वहां रिश्‍ते बुनेंगे. जहां रिश्‍ते बनेंगे, वहां मन मिलेंगे. हम मिलेंगे तो मनमुटाव भी होगा. रिश्‍तों में दूरी, तनाव का एक कारण एक दूसरे को बर्दाश्‍त करने की कम होती क्षमता भी है. हमें याद रखना होगा कि एक दूसरे के लिए मुसीबत सहना ही पर्याप्‍त नहीं है. एक दूसरे के लिए हमेशा जान की बाज़ी लगाए रखने से प्रेम नहीं बचा रहता.

डियर जिंदगी: विश्‍वास के भरोसे का टूटना !

प्रेम को बचाए, बनाए रखने के लिए हमेशा जान देने की जरूरत नहीं होती, उसे ‘शांतिकाल’ में भी स्‍नेह चाहिए. माफी की आदत जितनी जल्‍दी हमारा स्‍वभाव बनेगी, हम तनाव, कुंठा से उतनी जल्‍दी बाहर निकलेंगे. मन को पीपल के पत्‍ते की तरह रखना है. यह किसी भी दूसरे पत्‍ते से हल्‍का होता है. ज़रा सी हवा चली नहीं कि झूमने लगा. हंसता ही रहता है. मन को भी ऐसे ही रखना है, खूब हल्‍का और प्रसन्‍न!

माफ करने के फायदों से जुड़ा एक किस्‍सा आपको सुनाता हूं.

डियर जिंदगी: बच्‍चों से मत कहिए, मुझसे बुरा कोई न होगा!

कहानी कोई चार बरस पुरानी है. यह मेरे जीवन का ही प्रसंग है. एक मित्र मुझे बेहद प्रिय हैं. मेरे विवाह के बाद इस मित्रता के दायरे में हम तीनों ही आ गए. यह दौर कई बरस चलने के बाद ऐसे मोड़ के बाद जाकर थमा, जिसे हम विवाह के नाम से जानते हैं. उनके विवाह के बाद! मैं और मेरी पत्‍नी इस बात को जब तब समझ पाते स्थितियां बहुत खराब हो गईं.

दिलचस्‍प बात यह रही कि इस बीच उनने, उनके परिवार ने मुझसे तो संबंध सामान्‍य बनाए रखे, लेकिन पत्‍नी से अघोषित दूरी बना ली. उनके परिवार के किसी व्‍यक्ति को हमारा साथ पसंद नहीं था.

लेकिन मित्र ने स्‍पष्‍टता से हमें यह बताने की जगह उलझा दिया. दो बरस के बाद हमें किसी दूसरे सिलसिले में इस बात की सूचना मिली. हम दोनों स्‍तब्‍ध थे. हम दोनों मित्र के पास गए, उनसे पूछा कि भाई, हमें 'डस्‍टबिन' में फेंकने से पहले, खुद से दूर करने से पहले हमारी गलती तो बता देते! उनने कहा, 'तुम्‍हारी कोई गलती नहीं, मैंने जो किया अपने परिवार के लिए किया. मैंने सोचा था तुम खुद समझ जाओगे!’

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अब हम भला क्‍या करते. हमें उनकी निर्णय क्षमता, संवेदनशीलता पर भी कोई संदेह नहीं. आज भी वह हमारे लिए जान की बाज़ी लगा सकते हैं. लेकिन जैसा कि हमने इस लेख के शुरू में कहा, प्रेम, स्‍नेह की जरूरत हमेशा ज़ंग के समय नहीं होती. शांतिकाल में भी होती है.

मैं और मेरी पत्‍नी मित्र के व्‍यवहार के कारण कई दिन, महीने परेशान रहे. फिर एक दिन आंखों के रास्‍ते सारा दर्द बाहर निकालने के बाद हमने फैसला किया कि दोस्‍त तो अपना है. आज उसने अलग होने का रास्‍ता चुना, भले ही जैसे भी चुना, लेकिन इससे प्रेम तो कम नहीं होता! प्रेम तो हमेशा रहने वाली चीज़ है. उसका कोई विकल्‍प नहीं.

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हम दोनों ने दोस्‍त को क्षमा करने का फैसला किया. हमेशा के लिए उसे मुक्‍त करने का फैसला किया. यकीन मानिए, जिस दिन से उसे दिल से माफ किया, हम कई गुना हल्‍के हो गए. मन साफ हो गया. अब वह हमारे घर नहीं आता. हम उसके घर नहीं जाते. लेकिन हमारे दिल में उसकी वह यादें हैं, जिनमें वह हमारे साथ पीपल के पत्‍तों की तरह मुस्‍कुराता रहता है.

उसे माफ करके, हम दोनों खुश हैं! वह भी मज़े में होगा, शायद. ध्‍यान दीजिए, मैंने उसके लिए शायद लिखा और अपने लिए खुशी! यह है, माफ करने का प्रतिफल! आप भी कीजिए, मज़े में जिंदगी जीना शुरू कीजिए. कितना कुछ है, करने को! और हम हैं कि दूसरों का बोझ लिए अपना हीमोग्‍लोबिन कम करते रहते हैं.

ईमेल dayashankar.mishra@zeemedia.esselgroup.com

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(लेखक ज़ी न्यूज़ के डिजिटल एडिटर हैं)

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