Bengal Election: पढ़िए बंगाल की 'दीदी' से जुड़ी अनसुनी कहानियां

पश्चिम बंगाल की सत्ता पर पिछले 10 साल से काबिज ममता बनर्जी ने अपने चुनावी दांवपेंच से हमेशा विरोधियों को चित्त किया है.  

Written by - Prabhat Thakur | Last Updated : Mar 2, 2021, 05:33 PM IST
  • Islamic history में मास्टर डिग्री लेने वाली ममता ने कानून की पढ़ाई भी की है
  • 1975 में कोलकाता में जेपी का विरोध करके ममता बनर्जी ने अपने सियासत चमकाई
Bengal Election: पढ़िए बंगाल की 'दीदी' से जुड़ी अनसुनी कहानियां

नई दिल्ली: तारीख 16 अगस्त, साल 1990 में बंगाल कांग्रेस ने राज्यव्यापी बंद का आयोजन किया था. ये बंद पुलिस फायरिंग में तीन लोगों के मारे जाने के विरोध में था. पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कई सालों बाद एक निजी चैनल को दिए इंटरव्यू में इस दिन का जिक्र किया.

उन्होंने कहाकि बंद वाले दिन प्रदेश की वाम सरकार के इशारे पर पुलिस और सीपीएम के लोग उन पर नजर रखे हुए थे. जैसे ही कांग्रेसी कार्यकर्ताओ के साथ वो आगे बढ़ी सीपीएम के लोगों ने उन पर हमला कर दिया.

ममता आगे कहती हैं कि लाठी डंडों से से उन पर इतना प्रहार किया गया कि उनके सिर और हाथों में इतनी गंभीर छोटे आयी कि एक महीने से अधिक समय तक उन्हें अस्पताल में गुजारना पड़ा.

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राजनीति के पंडितों का दावा है कि इस दिन ममता के साथ मारपीट की घटना उनके कांग्रेस छोड़ने की कुछ प्रमुख कारणों में से एक थी. गौरतलब है कि बाद में वर्षों में उन्होंने नई पार्टी तृणमूल कांग्रेस बनाई. आगे चलकर यही पार्टी राज्य की सत्ता पर काबिज हुई और ममता सूबे की सबसे ताकतवर महिला बनीं.

बचपन से सीखी राजनीति की abc

वैसे तृणमूल कांग्रेस की मुखिया और वर्तमान में बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की कांग्रेस से अलविदा लेने और तृणमूल कांग्रेस बनाने की कहानी भी दिलचस्प है.

कांग्रेसी परिवार में जन्मीं ममता बनर्जी ने शायद ही ये सोचा होगा कि एक दिन ऐसा आएगा जब उन्हें कांग्रेस से अलग होकर पार्टी बनानी पड़ेगी. दरअसल प्रोमिलेश्वर बनर्जी के घर जन्मीं ममता बनर्जी का शुरुआत से ही राजनीति में सक्रिय होना लाजमी था क्योंकि पिता पहले से ही कांग्रेस के सक्रिय नेता थे.

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ममता बचपन से ही पिता के साथ सभाओं में जाया करती थी. इससे राजनीति में उनकी दिलचस्पी और गहरी होती गई. इसका परिणाम यह रहा कि ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं. उन्हें लोकप्रिय रूप से दीदी के नाम से जाना जाता है, जिसका अर्थ है बड़ी बहन.

Islamic history में मास्टर

ममता ने इतिहास में ऑनर्स डिग्री, Islamic history में मास्टर डिग्री ली है. उन्होंने शिक्षा और कानून की भी पढ़ाई की है. वे कविताएं लिखती हैं और पेंटिंग्स बनाती है. 1991 में नरसिम्हाराव की सरकार में वे मानव संसाधन, युवा कल्याण– खेलकूद और महिला-बाल विकास विभाग की राज्यमंत्री भी रहीं.

उनके द्वारा प्रस्तावित खेल–कूद विकास योजना को सरकार की बहाली न मिलने पर उन्होंने विरोध के तौर पर अपना इस्तीफा दे दिया. ममता बनर्जी ने काफी स्पष्ट शब्दों में कहा कि उन्हें स्वच्छ कांग्रेस चाहिए.

सन 1996 में केंद्रीय मंत्री रहते हुए उन्होंने अपनी ही सरकार द्वारा पेट्रोल की कीमत बढ़ाये जाने पर विरोध व्यक्त किया था. कांग्रेस से मतभेद के चलते उन्होंने कांग्रेस पार्टी छोड़कर अपना अलग दल बनाने का निश्चय किया और आल इंडिया तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की.

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उनकी पार्टी ने काफी कम समय में बंगाल की साम्यवादी सरकार के खिलाफ कड़ी चुनौती खड़ी कर दी. अपने घर में सबसे प्यारी दीदी कब सूबे की प्यारी दीदी बनकर उभरी शायद ममता ने भी ये न सोचा था.

जेपी से भिड़ गई

उनसे जुड़ा एक और किस्सा भी मशहूर है. 1975 में जब जेपी का डंका पूरे देश में बज रहा था तब कोलकाता में उनके कार के सामने आकर विरोध प्रदर्शन करने वाली एक दुबली पतली लड़की ने सबका ध्यान खींचा. ये लड़की ममता बनर्जी थीं.

हालांकि राजनीतिक पंडित ये दावा करते हैं कि हर काम को अपने वसूलों पर करने वाली ममता बनर्जी ने ये काम उसके विपरीत किया था. फिलहाल जिस एक व्यक्ति का अनुसरण कर देश भर का युवा भारत में बदलाव लाने की कोशिश कर रहा था.

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उसी व्यक्ति का विरोध दर्ज कर ममता ने सबका ध्यान अपनी ओर खींचा और राज्य के कांग्रेस आलाकमान में अपनी धमाकेदार उपस्थिति दर्ज करवायी.

सोमनाथ को चटाया धूल

इस घटना से ममता का सियासी कद बढ़ा दिया जिसका नतीजा कहे कि साल 1984 में ममता को कद्दावर नेता सोमनाथ चटर्जी के खिलाफ जाधवपुर से उम्मीदवार बनाया गया.

किसी ने भी ये कल्पना नहीं की होगी कि ममता बनर्जी ये चुनाव जीतेंगी लेकिन नतीजा ममता के पक्ष में रहा तमाम समीकरण के उल्ट ममता बनर्जी ने धमाकेदार जीत दर्ज की और जायंट किलर की उपाधि भी मिली और सियासत में उनका कद और बढ़ता चला गया.

यही नहीं उनकी इस जीत ने राजीव गांधी का ध्यान भी अपनी ओर खींचा और यूथ कांग्रेस का महासचिव बनाया गया. उस सीट को 1989 में उन्होंने खो दिया था और हालांकि 1991 में फिर से जीत हासिल की. 2009 के आम चुनावों तक उन्होंने सीट को बरकरार रखा.

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उन्होंने 1997 में अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की और दो बार रेल मंत्री बनीं. एनडीए और यूपीए दोनों के साथ गठजोड़ के बाद नंदीग्राम और सिंगूर आंदोलनों के दौरान बनर्जी की प्रमुखता और भी बढ़ गई.

इस बार चुनौती है बड़ी

अंत में, वे 2011 में और 2016 में भी अधिक बहुमत के साथ पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री चुनी गईं. ये ममता का ढृढ़ निश्चय ही कहे कि हर कठिन काम लक्ष्य को ममता ने अपनी राजनीतिक कुशलता और सूझबूझ से हल कर  लिया.

हालांकि आगामी आने वाला चुनाव भी ममता के लिए नई चुनौती भरा चुनाव है. एक तरफ केंद्र की मजबूत बीजेपी सरकार से सीधी टक्कर है जो कि पूरी जोर शोर से मैदान में पहली बार सूबे में कमल खिलाने को और परिवर्तन लाने को ताल ठोक रही है तो दूसरी तरफ वाम दल और कांग्रेस भी मैदान में हुंकार भर रहे हैं.

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लेकिन सियासी पंडितों के अनुमान से कहा जाए तो मुकाबला सीधा बीजेपी और ममता बनर्जी में बताया जा रहा है. और ये कहने में कोई दो मत नहीं है कि इस बार कड़ी चुनौती ममता बनर्जी के सामने है.

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