डियर जिंदगी : बच्चों के प्रति नजरिया…
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डियर जिंदगी : बच्चों के प्रति नजरिया…

आपसे विनम्र अनुरोध है कि अपने बच्‍चों की परवरिश से दुविधा, अनिर्णय, कठोरता और अपने ‘भोगे’ को हमेशा के लिए बाहर कर दें.

डियर जिंदगी : बच्चों के प्रति नजरिया…

‘डियर जिंदगी’ की सुधि, सजग पाठक सुलक्षणा त्र‍िपाठी ने बच्‍चे के मन में क्‍या है…’ पर प्रतिक्रिया देते हुए लिखा है कि जब हम युवा होते हैं तो अपने माता-पिता के प्रति हमारा नजरिया अक्‍सर ‘वह नहीं समझते’ वाला होता है! और जैसे ही हम माता-पिता बन जाते हैं, अपने बच्‍चे के प्रति वही रवैया हो जाता है, जिससे हम कभी नाखुश थे. ऐसा क्‍यों हम वैसी ही दुनिया बनाने में जुट जाते हैं, जो असल में हमें पसंद नहीं थी. 

सुलक्षणा जी ने ऐसी बात की ओर ध्‍यान दिलाया है जो कहानी घर-घर की है. हर दूसरे मध्‍यमवर्गीय परिवार का यही सबसे बड़ा ‘कंट्रोवर्सी’ जोन है. जहां आकर हमारी सारी ऊर्जा और सृजनात्‍मकता आगे बढ़ने की बजाए चीजों को बनाए, बचाए रखने में खपने लगती है.

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अगर हम अपने जीवन-दर्शन को यहां थोड़ा भी संतुलित कर लें तो न केवल इस ‘कंट्रोवर्सी’ से बच सकते हैं, बल्कि जीवन में अपनी सोच, समझ और ऊर्जा को वहां तक ले जा सकते हैं, जिसके बारे में शायद हमने सोचा भी न हो. 

आइए, एक मिसाल से संवाद शुरू करते हैं… 

चंडीगढ़ के आकाश मलहोत्रा के माता-पिता चाहते थे कि वह डॉक्‍टर बनें, जबकि वह अपने मन में इंजीनियरिंग के पिलर बुने जा रहे थे. लेकिन आखिर उसे डॉक्‍टरी की तैयारी में झोंक दिया गया, जहां उसके चार से अधिक बेशकीमती साल खराब हुए. मेडिकल में उसका चयन भी नहीं हुआ. अंत में किसी तरह उसने बैंकिंग की तैयारी करते हुए क्‍लर्क की परीक्षा पास की. और बैंक में उसकी नौकरी लग गई. 

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अब बीस साल बाद... 

आकाश का बेटा क्रिकेटर बनना चाहता है. स्‍कूल के कोच ने भी आकाश को समझाने की कोशिश की, लेकिन आकाश अब एकदम अपने पिता की तरह ‘व्‍यवहार’ कर रहा है. 

उसका कहना है कि उसके जैसे मध्‍यमवर्गीय परिवार के लिए क्रिकेट जैसे इतनी गलाकाट प्रतियोगिता वाले क्षेत्र में जाना बेहद जोखिम वाला है. इसे परिवार सहन करने की स्थिति में नहीं है. 

जब आकाश को इन दिनों चर्चा में रहे पृथ्‍वी शॉ और सबकुछ हासिल कर चुके एमएस धोनी की मिसाल देने की कोशिश की गई, तो उसने यह कहते हुए अपने बेटे का साथ देने से इंकार कर दिया कि इतनी ‘हिम्‍मत’ नहीं है. 

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जबकि यह हिम्‍मत से अधिक नजरिए का सवाल है. आपकी सोच किस दिशा में है, प्रश्न उसका है. अक्‍सर यह देखने में आया है कि बचपन में जिन बच्‍चों को प्रेम कम मिलता है, उनकी परवरिश में स्‍नेह, आत्‍मीयता की जगह कठोरता अधिक होती है, वह आगे चलकर उतने ही कठोर होते जाते हैं. दूसरों के प्रति. 

यहां दूसरों के प्रति से अर्थ उनकी जिंदगी में मौजूद उनके अतिरिक्‍त हर किसी से है! आकाश का बेटा ‘दूसरा’ थोड़ी है, लेकिन इस अर्थ में वह यहां दूसरा हो गया कि आकाश अपने साथ ही हर किसी से कठोर है. क्‍योंकि उसके बचपन में प्रेम, आत्‍मीयता और स्‍नेह का लेप उसके कोमल मन की दीवार पर कुछ कम रह गया. 

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ऐसे लोग जिनको कभी न कभी दबाया गया हो. जो कभी पीड़ित रहे हों, जब कभी उनके पास अधिकार की शक्ति आती है, अक्‍सर यह देखने को मिलता है कि उनके निर्णय में एक किस्‍म का ‘बदला’ होता है! क्‍योंकि वह जीवन के अप्रिय व्यवहार से बाहर नहीं आ पाते. वह कहने को तो बड़े हो गए हैं, लेकिन असल में वह रहते ‘छोटे’ बच्‍चे ही हैं. वह परिपक्‍व नहीं होते! 

इसमें अकेले उनकी गलती नहीं. वह इसलिए परिपक्‍व (मैच्‍योर) नहीं हो पाते, क्‍योंकि जिंदगी के प्रति समावेशी, उदार दृष्टि नहीं रखते. उनको इसका अभ्‍यास ही नहीं. अब जो रास्‍ता कभी दिखाया नहीं गया, जिस पर कभी चलाया नहीं गया, उधर भला कैसे जाइएगा! हम वैसे भी नए रास्‍तों पर चलने में बड़े कमजोर हैं. 

हमें सबकुछ रटा-रटाया करने की आदत है! इसीलिए हम अपने बच्‍चों से भी वैसे आचरण से पेश आते हैं, जैसा हमें खुद अपने प्रति पसंद नहीं था! 

इसलिए, आपसे विनम्र अनुरोध है कि अपने बच्‍चों की परवरिश से दुविधा, अनिर्णय, कठोरता और अपने ‘भोगे’ हुए को हमेशा के लिए से बाहर कर दें. 

बच्‍चों को वह कोमलता, स्‍नेह और आशा दीजिए, जिसके लिए आप तरसते थे! न कि अपने ‘भोगे’ किसी कड़वे अंश को दोहराते रहिए, जो मन में किसी मैल की तरह बैठा है!

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