डियर जिंदगी : अपनी जिंदगी में दूसरे का ‘हिस्‍सा’

शिक्षित होने की सबसे बड़ी शिक्षा ही मनुष्‍यता है. बाकी उसके साथ जो मिले वह तो मूल के साथ सूद जैसी बात है.

डियर जिंदगी : अपनी जिंदगी में दूसरे का ‘हिस्‍सा’

मेरा जीवन अपनों के लिए है. यह एक परंपरागत लोकप्रिय भारतीय विचार है. हां यह जरूर हुआ है कि अपनों की परिभाषा निरंतर बदल रही है. जीवन में विज्ञान, धन और करियर के बढ़ते अवसर के साथ शहरों में फ्लैट कल्‍चर की इसमें खास भूमिका है. होते-होते अपनों की परिभाषा संकुचित होती जा रही है. पहले इसमें संयुक्‍त परिवार आता था जो अब बहुत पीछे छूट गया सा महसूस होता है. अब तो परिवार का अर्थ माता-पिता और उनके एक या दो जो भी बच्‍चे हैं वहीं तक सीमित हो गया है.

लेकिन इन ‘सीमित’ होने की कहानियों के बीच वसुधैव कुटुम्बकम की कहानियां गहरे अंधेरे में रोशनी की तरह हैं. मन का ऐसा उजाला जिसमें सारी दुनिया अपना घर है. मध्‍य प्रदेश के भोपाल निवासी सुपरिचित पत्रकार, लेखक और सोशल मीडिया पर मुखर विधु लता की बेटी रूपल ने अमेरिका में कुछ ऐसा किया है, जिसकी रोशनी से मन के अनेक अंधेरे उजालों में तब्‍दील हो सकते हैं.

डियर जिंदगी : अनूठी 'उधारी' और मदद का बूमरैंग...

छोटी-छोटी चीजों में मेरा-तेरा के फेर में उलझे समाज को रूपल मनुष्‍यता का बोध बेहद सरलता से कराती हैं. अपने देश में अपने परिवार के सदस्‍य के लिए एक सेमेस्‍टर का ब्रेक लेने वाले तो कई मिल जाएंगे, लेकिन अमेरिका जैसे देश में पढ़ने के लिए गईं रूपल ने जब यह फैसला किया होगा कि ब्रेस्‍ट कैंसर से 4 साल से जूझ रही महिला टिबी की देखभाल के लिए उन्‍हें एक सेमेस्‍टर का ब्रेक लेना है तो कुछ सवाल उनके मन में भी आए ही होंगे. लेकिन उन्होंने सबकुछ छोड़ अपनी अमेरिकन पड़ोसी की देखभाल करना चुना.

शिक्षित होने की सबसे बड़ी शिक्षा ही मनुष्‍यता है. बाकी उसके साथ जो मिले वह तो मूल के साथ सूद जैसी बात है. अब पूरी कहानी सुनिए जो रूपल की मां विधु लता ने साझा की है. रूपल अमेरिका में टिबी और उनके जर्मन पति की पड़ोसी हैं. टिबी ने चार बरस तक ब्रेस्‍ट कैंसर से लड़ने के बाद उस पर जीत हासिल की है. रूपल ने उनके इस संघर्ष में एक पड़ोसी से बढ़कर उनके परिवार के सदस्‍य की तरह अपनी भूमिका निभाई.

डियर जिंदगी : 'चीजों' की जगह अनुभव चुनिए...

रूपल उनके लिए सूप बनाने से लेकर भारतीय भोजन तक का इंतजाम करने से कहीं अधिक जरूरी उनके साथ समय बिताने का काम करती थीं. इसके साथ वह टिबी को कविता, कहानी और चुटकुले भी हिंदी से अंग्रेजी में अनुवाद करके सुनाती रहीं.

इस बेहद अनुशासित, आत्‍मीय देखभाल के कुछ महीनों बाद रूपल अपनी मां विधु लता को फोन करके डरते-डरते लेकिन सधी आवाज में कहती हैं, 'मां, गुस्सा तो नहीं करोगी कसम खाओ, हमने एक सेमेस्टर का ब्रेक ले लिया टिबी के लिए!'

डियर जिंदगी: मेरी अनुमति के बिना आप मुझे दुखी नहीं कर सकते!

मैं विश्‍वास के साथ कह सकता हूं कि विधु लता जी के लिए उनकी बिटिया ने गुस्‍सा होने की कोई वजह ही नहीं छोड़ी है.

पहली नजर में इस किस्‍से का श्रेय रूपल को देने का मन करता है, लेकिन जैसे ही हम थोड़ा ठहरते हैं, श्रेय अपना रास्‍ता बदलकर विधु लता की ओर चल देता है. रूपल ने मनुष्‍य और मनुष्‍यता का जो स्‍नेह अमेरिका में जाकर बिखेरा है, वह उस परवरिश, रिश्‍तों में आत्‍मीयता के स्‍नेह, मनुष्यता के घोल का परिणाम है, जिसकी कमी समाज में हर दिन तेजी से बढ़ती जा रही है.

डियर जिंदगी: सब 'मन' का होता है कभी!

समाज में प्रेम, आत्‍मीयता और मनुष्यता की कमी के कारण ही अविश्‍वास और तनाव बढ़ रहा है. इसकी जिम्‍मेदारी बच्‍चों से कहीं अधिक बड़ों की है. हम बिना पौधा लगाए, पेड़ की बात नहीं कर सकते, यह जितनी जल्‍दी समझ लेंगे, हम उतने ही प्रसन्‍न, सुखी और आनंदमयी रहेंगे.

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(लेखक ज़ी न्यूज़ में डिजिटल एडिटर हैं)

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