डियर जिंदगी: अतरंगी सपने!

अतरंगी सपने ही असल में हमारे हैं. वही हमें हमारे होने का बोध कराते हैं. ऐसे सपनों की महक को अपने भीतर खोजना, उनके लिए पागल हुए बिना अपने होने को हासिल नहीं किया जा सकता!

डियर जिंदगी: अतरंगी सपने!

हम अक्‍सर वही सपने देखते हैं, जो हमें दूसरी आंख से दिखाए गए थे. वही जो अभिभावक की आंखों में बसते रहे, लेकिन अधूरे रहे. वह भी जो प्रतिष्‍ठा, ग्‍लैमर से आत्‍मा, दिमाग पर आरोपित किए गए, भले ही हमारे मन को न भाए हों. दूसरों के दिखाए सपने से जिंदगी पटरी पर न दौड़ती हो, ऐसा भी नहीं, लेकिन असल रंग तो उस ख्‍वाब में ही भरते हैं, जो अपनी आंखों, चेतना की रगों में दौड़ते हैं.

अतरंगी सपने ही असल में हमारे हैं. वही हमें हमारे होने का असल बोध कराते हैं. ऐसे सपनों की महक को अपने भीतर खोजना, उनके लिए पागल हुए बिना अपने होने को हासिल नहीं किया जा सकता!

दुनिया को एक से बढ़कर एक आविष्‍कार, नई राह, सोच देने वालों का जीवन यही तो कहता है. कोई भी नई राह, यहां तक कि पगडंडी भी मुश्किल की सीढ़ियां चढ़े बिना नहीं मिलती. हम थॉमस अल्‍वा एडीशन की कहानियां इतनी बार सुन चुके हैं कि वह हमें कंठस्‍थ हो चली हैं. लेकिन हम इन जीवनियों से सीखे क्‍या हैं!

डियर जिंदगी: अकेलेपन की सुरंग और ‘ऑक्‍सीजन’!

कम से भारतीय समाज, युवा सोच पर तो हमें इस जीवन दर्शन की झलक नहीं मिलती. हमारे बिजनेस स्‍कूल, एमबीए कॉलेज तक इस सोच को समझाने में नाकामयाब रहे. यही कारण है कि हमारे यहां जोखिम लेकर सपने के पीछे पागल होने का चलन लगभग खत्‍म है. हां, इधर पांच से दस बरस में स्‍टार्टअप कल्‍चर आया जरूर, लेकिन उसमें किसी भी कीमत पर टिके रहने, प्रोफेशनलिज्‍म की भारी कमी देखी गई. वहां अपनी पहचान से अधिक सुरक्षित रास्‍ता लेकर निकलने का हुनर अधिक देखा गया.

इसे इस तरह भी समझा जाना चाहिए कि जब आप अपने लिए सुरक्षित भविष्‍य नौकरी में खोजने निकल जाते हैं, तो अतरंगी सपने तक कैसे पहुंचेंगे!

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थोड़ा और ध्‍यान से सोचेंगे, देखेंगे, तो पाएंगे कि एक जमाने में हर माता-पिता अपने बच्‍चे को आईएएस में क्‍यों भेजना चाहते थे! क्‍यों कलेक्‍टर से बड़ा तहसीलदार था! इसलिए, क्‍योंकि इनमें रौब था. प्रतिष्‍ठा के साथ अघोषित आय, सामाजिक रौब जैसे अनंत कारण थे.

तो एक लकीर बन गई! जिस ओर हम हर उस बच्‍चे को भेजने लगे, जिसमें थोड़ी भी प्रतिभा हमें दिखाई देती. इस रटी-रटाई सोच, सुरक्षित रास्‍ता लेने की आदत ने हमारी पूरी एक पीढ़ी को तबाह कर दिया.

कुछ दिन पहले मुझे छत्‍तीसगढ़ के एक लेखक, पूर्व आईएएस अफसर मिले. संयोग से वह ‘डियर जिंदगी’ से परिचित थे, मुझसे नहीं. सफर की शुरुआत उन्होंने इंटरनेट की तारीफ करते हुए की. उन्‍होंने कहा, 'आत्‍महत्‍या और तनाव का खतरा बहुत बढ़ गया है. इस पर बात हो रही है, लेकिन उतनी नहीं. कोई ‘डियर जिंदगी’ के नाम से लिखते हैं, अच्‍छा है, पढ़िएगा!'

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कुछ देर संवाद के बाद उन्होंने छोटे भाई की तीस बरस पुरानी कहानी बताई. जो आज इतने बरस बाद भी समाज की सबसे बड़ी चिंता है.

उनने कहा, ‘मेरे आईएएस में चुने जाने के बाद पिता चाहते थे कि भाई भी आईएएस में चुना जाए. वह चित्रकार बनना चाहता था. जेजे स्‍कूल ऑफ आर्टस में उसने प्रवेश परीक्षा पास कर ली, लेकिन चिट्ठी समय से नहीं मिली. इधर पिताजी अड़े थे कि खानदान का नाम पेंटर बनने से खराब हो जाएगा. उसे आईएएस की तैयारी के लिए दिल्‍ली भेज दिया. तब उसे दाखिले की चिट्ठी मिली. लेकिन वह दिल्‍ली के लिए निकल चुका था. उसे सूचना दी गई. लेकिन देर हो गई. उसे प्रवेश नहीं मिला. वह नहीं लौटा और उसने मुंबई में ही आत्‍महत्‍या कर ली.’

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कहते हुए वह भावुक हो गए. कुछ रुककर बोले, ‘काश! पिताजी ने उसे अपने सपने जीने की आजादी दी होती. लेकिन मैं आज भी देख रहा हूं कि बच्‍चों पर अपने सपने थोपने की लत थमी नहीं. हम कब परिपक्‍व समाज बनेंगे.’

उनके शब्‍द कई दिन मेरे कानों में गूंजते रहे.

मुझे लगता है कि भले ही माता-पिता न समझें. कोई भी न समझे. लेकिन कम से कम सपने देखने वाली आंख को तो अपने सपने पर यकीन हो. अपने दिमाग पर हमारा इतना नियंत्रण तो होना ही चाहिए कि हम किसी दुख, दूसरे के निर्णय को अपने ऊपर ऐसे न हावी होने दें कि जिंदगी की ऑक्‍सीजन सप्‍लाई खुद आगे बढ़कर काट दें.

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मैं लडूंगा. संघर्ष करूंगा. उन सबसे जो मेरे सपने को पागलपन कहते हैं. मेरे ख्‍वाब को अपने रंग देने की कोशिश में हैं. लेकिन मैं हारूंगा नहीं, मैं पीछे नहीं हटूंगा. मुझे जिंदा रहकर ख्‍वाब पूरे करने हैं. जो मेरे जिंदा रहने से नहीं बदलते, वह जान देने से नहीं बदलेंगे! इस बात को हमें बेहद गहराई से बच्‍चों के दिल, दिमाग तक पहुंचाने की जरूरत है.

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